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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 8 • श्लोक 3
सोऽयमपीक्षां चक्रे ततो मनुष्या अजायन्त । इत्युपनिषदः प्राहुर्दयितां प्रति याज्ञवल्क्योक्त्या ॥
तब यह आकाश (आकाश के समान शून्यप्राय पुरुष) सर्वदा स्त्री के द्वारा ही पूर्ण होता है। उस स्त्री ने ईक्षण किया और तब उससे मनुष्यों की उत्पत्ति हुई।
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