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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 8 • श्लोक 5
सदसद्विलक्षणासौ परमात्मसदाश्रयानादिः । सा च गुणत्रयरूपा सूते सचराचरं विश्वम् ॥
यह माया सत् और असत् से विलक्षण है, अनादि है और सदैव परमात्मा के आश्रय रहने वाली है। यह त्रिगुणात्मिका माया ही चराचर जगत्‌ को उत्पन्न करती है।
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