चिरमानन्दानुभवात्सुषुप्तिरिव काप्यवस्थाभूत् ।
परमात्मनस्तु तस्मात्स्वप्नवदेवोत्थिता माया ॥
चिरकालीन आनन्द का अनुभव करते-करते परमात्मा की सुषुप्ति के समान कोई अवस्था हो गयी थी। उसी से स्वप्न के समान माया का आविर्भाव हुआ।
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