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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 8 • श्लोक 10
रजनीवातिदुरन्ता न लक्ष्यतेऽत्र स्वभवोऽस्याः । सौदामिनीव नश्यति मुनिभिः सम्प्रक्ष्यमाणैव ॥
यह अन्धकारमयी रात्रि के समान दुरन्त है, इसके स्वभाव का कुछ पता ही नहीं चलता; क्योंकि मुनिजनों द्वारा विचारपूर्वक देखी जाते ही यह बिजली के समान तुरन्त नष्ट हो जाती है।
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