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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 8 • श्लोक 7
स्वप्ने सुरतानुभवाच्छुक्रद्रावोयथा शुभे वसने । अनृतं रतं प्रबोधे वसनोपहतिर्भवेत्सत्या ॥
स्वप्न में स्त्री-सम्भोग का अनुभव होने से जिस प्रकार शुद्ध वस्त्र में ही वीर्यपात हो जाता है (उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृति से व्यक्त जगत् हो जाता है) जग जाने पर स्वप्न का रमण तो मिथ्या हो जाता है, किन्तु उससे वस्त्र सचमुच बिगड़ जाता है।
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