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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 8 • श्लोक 11
माया ब्रह्मोपगताविद्या जीवाश्रया प्रोक्ता । चिदश्चिद्ग्रन्थिश्चेतस्तदक्षयं ज्ञेयमा मोक्षात् ॥
यह ब्रह्म के अधीन होने से 'माया' और जीव के आश्रित होने से 'अविद्या' कही जाती है। यह जड़ और चेतन की ग्रन्थि ही 'चित्त' है। इसे जब तक मोक्ष न हो, अक्षय ही जानना चाहिये।
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