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अध्याय 1 — जपजी साहिब

जपजी साहिब
42 श्लोक • केवल अनुवाद
- इस शब्द का शुद्ध उच्चारण है - 'एक ओंकार'। इसके उच्चारण में इसके तीन अंश किए जाते हैं। इन तीनों के भावार्थ भी अलग-अलग ही हैं। - एक (अद्वितीय)। - वही। ओंकार (~) निरंकार; अर्थात्-ब्रह्म, करतार, ईश्वर, परमात्मा, भगवान, वाहिगुरु। १ ऑ - निरंकार वही एक है। सति नामु उसका नाम सत्य है। करता - वह सृष्टि व उसके जीवों की रचना करने वाला है। पुरखु - वह यह सब कुछ करने में परिपूर्ण (शक्तिवान) है। निरभउ - उसमें किसी तरह का भय व्याप्त नहीं। अर्थात् - अन्य देव-दैत्यों तथा सांसारिक जीवों की भाँति उसमें द्वेष अथवा जन्म-मरण का भय नहीं है; वह इन सबसे परे हैं। निरवैरु - वह बैर (द्वेष/दुश्मनी) से रहित है। अकाल - वह काल (मृत्यु) से परे है; अर्थात् - वह अविनाशी है। मूरति - वह अविनाशी होने के कारण उसका अस्तित्व सदैव रहता है। अजूनी - वह कोई योनि धारण नहीं करता, क्योंकि वह आवागमन के चक्कर से रहित है। सैभं - वह स्वयं से प्रकाशमान हुआ है। गुर - अंधकार (अज्ञान) में प्रकाश (ज्ञान) करने वाला (गुरु)। प्रसादि - कृपा की बख्शिश। अर्थात् - गुरु की कृपा से यह सब उपलब्ध हो सकता है।
जाप करो। (इसे गुरु की वाणी का शीर्षक भी माना गया है।)
निरंकार भी (अकाल पुरुष) सृष्टि की रचना से पहले सत्य था, युगों के प्रारम्भ में भी सत्य (स्वरूप) था। अब वर्तमान में भी उसी का अस्तित्व है, श्री गुरु नानक देव जी का कथन है भविष्य में भी उसी सत्यस्वरूप निरंकार का अस्तित्व होगा।
यदि कोई लाख बार शौच (स्नानादि) करता रहे तो भी इस शरीर के बाहरी स्नान से मन की पवित्रता नहीं हो सकती। मन की पवित्रता के बिना परमेश्वर (वाहिगुरु) के प्रति विचार भी नहीं किया जा सकता। यदि कोई एकाग्रचित्त समाधि लगाकर मुँह से चुप्पी धारण कर ले तो भी मन की शांति (चुप) प्राप्त नहीं हो सकती; जब तक कि मन से झूठे विकार नहीं निकल जाते। बेशक कोई जगत की समस्त पुरियों के पदार्थों को ग्रहण कर ले तो भी पेट से भूखे रह कर (व्रत आदि करके) इस मन की तृष्णा रूपी भूख को नहीं मिटा सकता। चाहे किसी के पास हज़ारों-लाखों चतुराई भरे विचार हों लेकिन ये सब अहंयुक्त होने के कारण परमेश्वर तक पहुँचने में कभी सहायक नहीं होते। अब प्रश्न पैदा होता है कि फिर परमात्मा के समक्ष सत्य का प्रकाश पुंज कैसे बना जा सकता है, हमारे और निरंकार के बीच मिथ्या की जो दीवार है वह कैसे टूट सकती है? सत्य रूप होने का मार्ग बताते हुए श्री गुरु नानक देव जी कथन करते हैं यह सृष्टि के प्रारंभ से ही लिखा चला आ रहा है कि ईश्वर के आदेश अधीन चलने से ही सांसारिक प्राणी यह सब कर सकता है।
(सृष्टि की रचना में) समस्त शरीर (निरंकार के) आदेश द्वारा ही रचे गए हैं, किन्तु उसके आदेश को मुँह से शब्द निकाल कर ब्यान नहीं किया जा सकता। परमेश्वर के आदेश से (इस धरा पर) अनेकानेक योनियों में जीवों का सृजन होता है, उसी के आदेश से ही मान-सम्मान (अथवा ऊँच नीच का पद) प्राप्त होता है। परमेश्वर (वाहिगुरु) के आदेश से ही जीव श्रेष्ठ अथवा निम्न जीवन प्राप्त करता है, उसके द्वारा ही लिखे गए आदेश से जीव सुख और दुख की अनुभूति करता है। परमात्मा के आदेश से ही कई जीवों को कृपा मिलती है, कई उसके आदेश से आवागमन के चक्र में फँसे रहते हैं। उस सर्वोच्च शक्ति परमेश्वर के अधीन ही सब-कुछ रहता है, उससे बाहर संसार का कोई कार्य नहीं है। हे नानक! यदि जीव उस अकाल पुरुष के आदेश को प्रसन्नचित्त होकर जान ले तो कोई भी आहंकारमयी 'मैं' के वश में नहीं रहेगा। यही अहंतत्व सांसारिक वैभव में लिप्त प्राणी को निरंकार के निकट नहीं होने देता।
कोई उसे अपने अंग-संग जानकर उसकी महिमा गाता है। अनेकानेक ने उसकी कीर्ति का कथन किया है किन्तु फिर अन्त नहीं हुआ। करोड़ों जीवों ने उसके गुणों का कथन किया है, फिर भी-उसका वास्तविक स्वरूप पाया नहीं जा सका। अकाल पुरुष दाता बनकर जीव को भौतिक पदार्थ (अथक) देता ही जा रहा है, (परंतु) जीव लेते हुए थक जाता है। समस्त जीव युगों-युगों से इन पदार्थों का भोग करते आ रहे हैं। आदेश करने वाले निरंकार की इच्छा से ही (सम्पूर्ण सृष्टि के) मार्ग चल रहे हैं। श्री गुरु नानक देव जी सृष्टि के जीवों को सुचेत करते हुए कहते हैं कि वह निरंकार (वाहिगुरु) चिंता रहित होकर (इस संसार के जीवों पर) सदैव प्रसन्न रहता है।
वह अकाल पुरुष (निरंकार) अपने सत्य नाम के साथ स्वयं भी सत्य है, उस (सत्य एवं सत्य नाम वाले) को प्रेम करने वाले ही अनंत कहते हैं। (समस्त देव, दैत्य, मनुष्य तथा पशु इत्यादि) जीव कहते रहते हैं, माँगते रहते हैं, (भौतिक पदार्थ) दे दे करते हैं, वह दाता (परमात्मा) सभी को देता ही रहता है। अब प्रश्न उत्पन्न होते हैं कि (जैसे अन्य राजा - महाराजाओं के समक्ष कुछ भेंट लेकर जाते हैं वैसे ही) उस परिपूर्ण परमात्मा के समक्ष क्या भेंट ले जाई जाए कि उसका द्वार सरलता से दिखाई दे जाए? जुबां से उसका गुणगान किस प्रकार का करें कि सुनकर वह अनंत शक्ति (ईश्वर) हमें प्रेम-प्रशाद प्रदान करे? इनका उत्तर गुरु महाराज स्पष्ट करते हैं कि प्रभात काल (अमृत वेला) में (जिस समय व्यक्ति का मन आम तौर पर सांसारिक उलझनों से विरक्त होता है) उस सत्य नाम वाले अकाल पुरुष का नाम-स्मरण करें और उसकी महिमा का गान करें, तभी उसका प्रेम प्राप्त कर सकते हैं। (इससे यदि उसकी कृपा हो जाए तो) गुरु जी बताते हैं कि कर्म मात्र से जीव को यह शरीर रूपी कपड़ा अर्थात् मानव जन्म प्राप्त होता है, इससे मुक्ति नहीं मिलती, मोक्ष प्राप्त करने के लिए उसकी कृपामयी दृष्टि चाहिए। हे नानक! इस प्रकार का बोध ग्रहण करो कि वह सत्य स्वरूप निरंकार ही सर्वस्व है इससे मनुष्य की समस्त शंकाएँ मिट जाएँगी।
वह परमात्मा किसी के द्वारा मूर्त रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता, न ही उसे बनाया जा सकता है। वह मायातीत होकर स्वयं से ही प्रकाशमान है। जिस मानव ने उस ईश्वर का नाम-स्मरण किया है उसी ने उसके दरबार में सम्मान प्राप्त किया है। श्री गुरु नानक देव जी का कथन है कि उस गुणों के भण्डार निरंकार की बंदगी करनी चाहिए। उसका गुणगान करते हुए, प्रशंसा सुनते हुए अपने हृदय में उसके प्रति श्रद्धा धारण करें। ऐसा करने से दुखों का नाश होकर घर में सुखों का वास हो जाता है। गुरु के मुँह से निकला हुआ शब्द ही वेदों का ज्ञान है, वही उपदेश रूपी ज्ञान सभी जगह विद्यमान है। गुरु ही शिव, विष्णु, ब्रह्मा और माता पार्वती है, क्योंकि गुरु परम शक्ति हैं। यदि मैं उस सर्गुण स्वरूप परमात्मा के बारे में जानता भी हूँ तो उसे कथन नहीं कर सकता, क्योंकि उसका कथन किया ही नहीं जा सकता। हे सच्चे गुरु! मुझे सिर्फ यही समझा दो कि समस्त जीवों का जो एकमात्र दाता है मैं कभी भी उसे भूल न पाऊं।
तीर्थ-स्नान भी तभी किया जा सकता है यदि ऐसा करना उसे स्वीकार हो, उस अकाल पुरुष की इच्छा के बिना में तीर्थ-स्नान करके क्या करूँगा, क्योंकि फिर तो यह सब अर्थहीन ही होगा। उस रचयिता की पैदा की हुई जितनी भी सृष्टि मैं देखता हूँ, उसमें कर्मों के बिना न कोई जीव कुछ प्राप्त करता है और न ही उसे कुछ मिलता है। यदि सच्चे गुरु का मात्र एक ज्ञान ग्रहण कर लिया जाए तो मानव जीव की बुद्धि रत्न, जवाहर व माणिक्य, जैसे पदार्थों से परिपूर्ण हो जाए। हे गुरु जी! मुझे सिर्फ यही बोध करवा दो कि सृष्टि के समस्त प्राणियों को देने वाला निरंकार मुझ से विस्मृत न हो।
यदि किसी मनुष्य अथवा योगी की योग-साधना करके चार युगों से दस गुणा अधिक, अर्थात्-चालीस युगों की आयु हो जाए। नवखण्डों (पौराणिक धर्म-ग्रन्थों में वर्णित इलावृत, किंपुरुष, भद्र, भारत, केतुमाल, हरि, हिरण्य, रम्य और कुश) में उसकी कीर्ति हो, सभी उसके सम्मान में साथ चलें। संसार में प्रख्यात पुरुष बनकर अपनी शोभा का गान करवाता रहे। यदि अकाल पुरुष की कृपादृष्टि में वह मनुष्य नहीं आया तो किसी ने भी उसकी क्षेम नहीं पूछनी। इतने वैभव तथा मान-सम्मान होने के बावजूद भी ऐसा मनुष्य परमात्मा के समक्ष कीटों मे क्षुद्र कीट अर्थात् अत्यंत अधम समझा जाता है, दोषयुक्त मनुष्य भी उसे दोषी समझेंगे। गुरु नानक जी का कथन है कि वह असीम-शक्ति निरंकार गुणहीन मनुष्यों को गुण प्रदान करता है और गुणी मनुष्यों को अतिरिक्त गुणवान बनाता है। परंतु ऐसा कोई और दिखाई नहीं देता, जो उस गुणों से परिपूर्ण परमात्मा को कोई गुण प्रदान कर सके।
परमात्मा का नाम सुनने, अर्थात् उसकी कीर्ति में अपने हृदय को लगाने के कारण ही सिद्ध, पीर, देव तथा नाथ इत्यादि को परम-पद की प्राप्ति हुई है। नाम सुनने से ही पृथ्वी, उसको धारण करने वाले वृषभ (पौराणिक धर्न ग्रन्थों के अनुसार जो धौला बैल इस भू-लोक को अपने सीगों पर टिकाए हुए है) तथा आकाश के स्थायित्व की शक्ति का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नाम सुनने से शाल्मलि, क्रौंच, जम्बू, पलक आदि सप्त द्वीपः भूः भवः, स्वः आदि चौदह लोक तथा अतल, वितल, सुतल आदि सातों पातालों की अन्तर्यामता प्राप्त होती है। नाम सुनने वाले को काल स्पर्श भी नहीं कर सकता। हे नानक! प्रभु के भक्त में सदैव आनंद का प्रकाश रहता है, परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व दुष्कर्मों का नाश होता है।
परमात्मा का नाम सुनने से ही शिव, ब्रह्मा तथा इन्द्र आदि उत्तम पदवी को प्राप्त कर सके हैं। मंदे लोग यानी कि बुरे कर्म करने वाले मनुष्य भी नाम को श्रवण करने मात्र से प्रशंसा के लायक हो जाते हैं। नाम के साथ जुड़ने से योगादि तथा शरीर के विशुद्ध, मणिपूरक, मूलाधार आदि षट्-चक्र के रहस्य का बोध हो जाता है। नाम सुनने से षट्-शास्त्र, (सांख्य, योग, न्याय आदि), सत्ताईस स्मृतियों (मनु, याज्ञवल्कय स्मृति आदि) तथा चारों वेदों का ज्ञान उपलब्ध होता है। हे नानक! संत जनों के हृदय में सदैव आनंद का प्रकाश रहता है। परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व दुष्कर्मों का नाश होता है।
नाम सुनने से मनुष्य को सत्य, संतोष व ज्ञान जैसे मूल धमों की प्राप्ति होती है। नाम को सुनने मात्र से समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ अठसठ तीरथों के स्नान का फल प्राप्त हो जाता है। निरंकार के नाम को सुनने के बाद बार-बार रसना पर लाने वाले मनुष्य को उसके दरबार में सम्मान प्राप्त होता है। नाम सुनने से परमात्मा में लीनता सरलता से हो जाती है, क्योंकि इससे आत्मिक शुद्धि होकर ज्ञान प्राप्त होता है। हे नानक! प्रभु के भक्तों को सदैव आत्मिक आनंद का प्रकाश रहता है। परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व दुष्कर्मों का नाश होता है।
नाम सुनने से गुणों के सागर श्री हरि में लीन हुआ जा सकता है। नाम-श्रवण के प्रभाव से ही शेख, पीर और बादशाह अपने पद पर शोभायमान हैं। अज्ञानी मनुष्य प्रभु-भक्ति का मार्ग नाम-श्रवण करने से ही प्राप्त कर सकते हैं। इस भव-सागर की अथाह गहराई को जान पाना भी नाम-श्रवण की शक्ति से सम्भव हो सकता है। हे नानक! सद्-पुरुषों के अंतर में सदैव आनंद का प्रकाश रहता है। परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व दुष्कर्मो का नाश होता है।
उस अकाल पुरुष का नाम सुनने के पश्चात उसे मानने वाले अर्थात् उसे अपने हृदय में बसाने वाले मनुष्य की अवस्था कथन नहीं की जा सकती। जो भी उसकी अवस्था का बखान करता है तो उसे अंत में पछताना पड़ता है क्योंकि यह सच कर लेना सरल नहीं है, ऐसी कोई रसना नहीं जो नाम से प्राप्त होने वाले आनन्द का रहस्योद्घाटन कर सके। ऐसी अवस्था को यदि लिखा भी जाए तो इसके लिए न कागज़ है, न कलम और न ही लिखने वाला कोई जिज्ञासु, जो वाहिगुरु में लिवलीन होने वाले का विचार कर सकें। परमात्मा का नाम सर्वश्रेष्ठ व मायातीत है। यदि कोई उसे अपने हृदय में बसा कर उसका चिन्तन करे।
परमात्मा का नाम सुनकर उसका चिन्तन करने से मन और बुद्धि में उत्तम प्रीति पैदा हो जाती है। चिन्तन करने से सम्पूर्ण सृष्टि का ज्ञान-बोध होता है। चिन्तन करने वाला मनुष्य कभी सांसारिक कष्टों अथवा परलोक में यमों के दण्ड का भोगी नहीं होता। चिन्तनशील मनुष्य अंतकाल में यमों के साथ नरकों में नहीं जाता, बल्कि देवगणों के साथ स्वर्ग-लोक को जाता है। परमात्मा का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है। यदि कोई उसे अपने हृदय में लीन करके उसका चिन्तन करे।
निरंकार के नाम का चिन्तन करने वाले मानव जीव के मार्ग में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं आती। चिन्तनशील मनुष्य संसार में शोभा का पात्र होता है। ऐसा व्यक्ति दुविधापूर्ण मार्ग अथवा साम्प्रदायिकता को छोड़ धर्म-पथ पर चलता है। चिन्तनशील का धर्म-कार्यों से सुदृढ़ सम्बन्ध होता है। परमात्मा का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है। यदि कोई उसे अपने हृदय में लीन करके उसका चिन्तन करे।
प्रभु के नाम का चिन्तन करने वाले मनुष्य मोक्ष द्वार को प्राप्त कर लेते हैं। चिन्तन करने वाले अपने समस्त परिजनों को भी उस नाम का आश्रय देते हैं। चिन्तनशील गुरसिख स्वयं तो इस भव-सांगर को पार करता ही है तथा अन्य संगियों को भी पार करवा देता है। चिन्तन करने वाला मानव जीव, हे नानक ! दर-दर का भिखारी नहीं बनता। परमात्मा का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है। यदि कोई उसे अपने हृदय में लीन करके उसका चिन्तन करे।
जिन्होंने प्रभु-नांम का चिन्तन किया है वे श्रेष्ठ संतजन निरंकार के द्वार पर स्वीकृत होते हैं, हैं, वे ही वहाँ पर प्रभुख होते हैं। ऐसे गुरुमुख प्यारे अकाल पुरुष की सभा में सम्मान पाते हैं। ऐसे सद्-पुरुष राज दरबार में शोभावान होते हैं। सगुणी मानव का ध्यान उस एक सतगुरु (निरंकार) में ही दृढ़ रहता है। यदि कोई व्यक्ति उस सृजनहार के बारे में कहना चाहे अथवा उसकी रचना का लेखा करे तो उस रचयिता की कुदरत का आकलन नहीं किया जा सकता। निरंकार द्वारा रची गई सृष्टि धर्म रूपी वृषभ (धौला बैल) ने अपने ऊपर टिका कर रखी हुई है जो कि दया का पुत्र है (क्योंकि मन में दया-भाव होगा तभी धर्म-कार्य इस मानव जीव से सम्भव होगा।) जिसे संतोष रूपी सूत्र के साथ बांधा हुआ है। यदि कोई परमात्मा के इस रहस्य को जान ले तो वह सत्यनिष्ठ हो सकता है। यदि कोई ईश्वर के इस कौतुक को नहीं मानता तो उसके मन में यही शंका उत्पन्न होगी कि उस शरीर धारी बैल पर इस धरती का कितना बोझ है, वह कितना बोझ उठाने की समर्था रखता है। क्योंकि इस धरती पर सृजनहार ने जो रचना की है वह परे से परे है, अनन्त है। फिर उस बैल का बोझ किस शक्ति पर आश्रित है। सृजनहार की इस रचना में अनेक जातियों, रंगों तथा अलग-अलग नाम से जाने जाने वाले लोग मौजूद हैं। जिनके मस्तिष्क पर परमात्मा की आज्ञा में चलने वाली कलम से कर्मो का लेखा लिखा गया है। किन्तु यदि कोई जन-साधारण इस कर्म-लेख को लिखने की बात कहे तो वह यह भी नहीं जान पाएगा कि यह लिखा जाने वाला लेखा कितना होगा। लिखने वाले उस परमात्मा में कितनी शक्ति होगी, उसका रूप कितना सुन्दर है। उसकी कितनी दात है, ऐसा कौन है जो उसका सम्पूर्ण अनुमान लगा सकता है। अकाल पुरुष के मात्र एक शब्द से समस्त सृष्टि का प्रसार हुआ है। उस एक शब्द रूपी आदेश से ही सृष्टि में एक से अनेक जीव-जन्तु, तथा अन्य पदार्थों के प्रवाह चल पड़े हैं। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्था का विचार कर सकूं। हे अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार! हे पारब्रह्म! तू सदा शाश्वत रूप हैं।
इस सृष्टि में असंख्य लोग उस सृजनहार का जाप करते हैं, असंख्य ही उसको प्रीत करने वाले हैं। असंख्य उसकी अर्चना करते हैं, असंख्य तपी तपस्या कर रहे है। असंख्य लोग धार्मिक ग्रंथों व वेदों आदि का मुंह द्वारा पाठ कर रहे हैं। असंख्य ही योग-साधना में लीन रह कर मन को आसक्तियों से मुक्त रखते हैं। असंख्य ऐसे भक्तजन हैं जो उस गुणी निरंकार के गुणों को विचार कर ज्ञान की उपलब्धि करते हैं। असंख्य सत्य को जानने वाले अथवा परमार्थ-पथ पर चलने वाले तथा दानी सज्जन हैं। असंख्य शूरवीर रणभूमि में शत्रु का सामना करते हुए शस्त्रों की मार सहते हैं। असंख्य मानव जीव मौन धारण करके एकाग्रचित होकर उस अकाल-पुरुष में लिवलीन रहते हैं। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्थता का विचार कर सकूं। हे अनन्त स्वरूप! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार! हे पारब्रह्म! तू सदा शाश्वत रूप हैं।
इस सृष्टि में असंख्य मनुष्य विमूढ़ तथा गहन अज्ञानी हैं। असंख्य चोर तथा अभक्ष्य खाने वाले हैं, जो दूसरों का माल चुरा कर खाते हैं। असंख्य ही ऐसे हैं जो अन्य लोगों पर जन-जुल्म से अत्याचार का शासन करके इस संसार को त्याग जाते हैं। असंख्य अधर्मी मनुष्य जो दूसरों का गला काट कर हत्या का पाप कमा रहे हैं। असंख्य ही पापी इस संसार से पाप करते हुए चले जाते हैं। असंख्य ही झूठा स्वभाव रखने वाले मिथ्या वचन बोलते फिरते हैं। असंख्य मानव ऐसे हैं जो मलिन बुद्धि होने के कारण विष्टा का भोजन खाते हैं। असंख्य लोग दूसरों की निन्दा करके अपने सिर पर पाप का बोझ रखते हैं। श्री गुरु नानक देव जी स्वयं को निम्न कहते हुए फरमाते हैं कि हमने तो कुकर्मी जीवों अर्थात् तामसी व असुरी सम्पदा वाली सृष्टि का कथन किया है। हे अनन्त स्वरूप! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार! हे पारब्रह्म! तू सदा शाश्वत रूप हैं।
उस सृजनहार की सृष्टि में असंख्य ही नाम तथा असंख्य ही स्थान वाले जीव विचरन कर रहे हैं; अथवा इस सृष्टि में अकाल-पुरुष के अनेकानेक नाम हैं तथा अनेकानेक ही स्थान हैं, जहाँ पर परमात्मा का वास रहता है। असंख्य ही अकल्पनीय लोक हैं। किन्तु जो मनुष्य उसकी रचना का गणित करते हुए 'असंख्य' शब्द का प्रयोग करते हैं उनके सिर पर भी भार पड़ता है। शब्दों द्वारा ही उस निरंकार के नाम को जपा जा सकता है, शब्दों से ही उसका गुणगान किया जा सकता है। परमात्मा के गुणों का ज्ञान भी शब्दों द्वारा हो सकता है तथा उसकी प्रशंसा भी शब्दों द्वारा ही कही जा सकती है। शब्दों द्वारा ही उसकी वाणी को लिखा व बोला जा सकता है। शब्दों द्वारा मस्तिष्क पर लिखे गए कर्मों को बताया जा सकता है। किन्तु जिस निरंकार ने यह कर्म लेख लिखे हैं उसके मस्तिष्क पर कोई कर्म-लेख नहीं है; अर्थात्-उसके कर्मों को न तो कोई कह सकता है और न उनका हिसाब रख सकता है। अकाल-पुरुष जिस प्रकार मनुष्य के कर्मों के अनुसार आदेश करता है, वैसे ही वह अपने कर्मों को भोगता है। सृजनहार ने इस सृष्टि का जितना प्रसार किया है, वह समस्त नाम-रूप ही है। कोई भी स्थान उसके नाम से रिक्त नहीं है। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्थता का विचार कर सकूं। हे अनन्त स्वरूप! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार! हे पारब्रह्म! तू सदा शाश्वत रूप हैं।
यदि यह शरीर, हाथ-पैर अथवा कोई अन्य अंग मलिन हो जाए तो पानी से धो लेने से उसकी गन्दगी व मिट्टी साफ हो जाती है। यदि कोई वस्त्र पेशाब आदि से अपवित्र हो जाए तो उसे साबुन के साथ धो लिया जाता है। यदि मनुष्य की बुद्धि दुष्कर्मों के करने से मलिन हो जाए तो वह वाहिगुरु के नाम का सिमरन करने से ही पवित्र हो सकती है। पुण्य और पाप मात्र कहने को ही नहीं हैं। अपितु इस संसार में रहकर जैसे-जैसे कर्म किए जाएँगे वही धर्मराज द्वारा भेजे गए चित्र-गुप्त लिख कर ले जाएंगे अर्थात् मानव जीव द्वारा इस धरती पर किए जाने वाले प्रत्येक अच्छे व बुरे कर्मों का हिसाब उसके साथ ही जाएगा, जिसके फलानुसार उसे स्वर्ग अथवा नरक की प्राप्ति होगी। सो मनुष्य स्वयं ही कर्म बीज बीजता है और स्वयं ही उसका फल प्राप्त करता है। गुरु नानक का कथन है की जीव इस संसार में अपने कर्मों का फल भोगने हेतु अकाल-पुरुष के आदेश से आता जाता रहेगा, अर्थात् जीव के कर्म उसे आवागमन के चक्र में ही रखेंगे, निरंकार जीव के कर्मों के अनुसार ही उसके फल की आज्ञा करेगा।
तीर्थ-यात्रा, तप-साधना, जीवों पर दया भाव करके तथा निःस्वार्थ दान देने से; यदि कोई मनुष्य सम्मान प्राप्त करता है तो वह अति लघु होता है। किन्तु जिन्होंने परमेश्वर के नाम को मन में प्रीत करके सुना व उसका निरन्तर चिन्तन किया है। उन्होंने अपने अंतर के तीर्थ का मानो स्नान कर लिया और अपनी मलिनता को दूर कर लिया। (अर्थात् उस जीव ने अपने हृदय में बसे हुए निरंकार में लीन होकर अपनी अन्तरात्मा की मैल को साफ कर लिया है।) हे सर्गुण स्वरूप! समस्त गुण आप में हैं, मुझ में शुभ-गुण कोई भी नहीं है। सदाचार के गुणों को धारण किए बिना परमेश्वर की भक्ति भी नहीं हो सकती। हे निरंकार! तुम्हारी सदा जय हो, तुम कल्याण स्वरूप हो, ब्रह्म रूप हो। तुम सत्य हो, चैतन्य हो और सदैव आनन्द स्वरूप हो। परमात्मा ने यह सृष्टि जब पैदा की थी तब कौन-सा समय, कौन-सा वक्त, कौन-सी तारीख, तथा कौन-सा दिन था। तब कौन-सी ऋतु, कौन-सा महीना था, जब यह प्रसार हुआ था, यह सब कौन जानता है। सृष्टि के प्रसार का निश्चित समय महा विद्वान, ऋषि-मुनि आदि भी नहीं जान पाए, यदि वे जान पाते तो निश्चय ही उन्होंने वेदों अथवा धर्म-ग्रन्थों में इसका उल्लेख किया होता। इस समय का ज्ञान तो काजियों को भी नहीं हो पाया, यदि उन्हें पता होता तो वे कुरान आदि में इसका उल्लेख अवश्य करते। इस सृष्टि की रचना का दिन, वार, ऋतु व महीना आदि कोई योगी भी नहीं जान पाया है। इसके बारे में तो जो इस जगत का रचयिता है वह स्वयं ही जान सकता है कि इस सृष्टि का प्रसार कब किया गया। मैं किस प्रकार उस अकाल पुरुष के कौतुक को कहूँ, कैसे उसकी प्रशंसा करूँ, किस प्रकार वर्णन करूँ और कैसे उसके भेद को जान सकता हूँ? सतगुरु जी कहते हैं कि कहने को तो हर कोई एक दूसरे से अधिक बुद्धिमान बनकर उस परमात्मा की श्लाघा को कहता है। किंतु परमेश्वर महान् है, उसका नाम उससे भी महान है, सृष्टि में जो भी हो रहा है वह सब उसके किए से ही हो रहा है। हे नानक! यदि कोई उसके गुणों को जानने की बात कहता है तो वह परलोक में जाकर शोभा प्राप्त नहीं करता। अर्थात यदि कोई जीव उस अभेद निरंकार के गुणात्मक रहस्य को जानने का अभिमान करता है तो उसे इस लोक में तो क्या परलोक में भी सम्मान नहीं मिलता।
सतगुरु जी जन-साधारण के मन में सात आकाश व सात पाताल होने के संशय की निवृति करते हुए कहते हैं कि सृष्टि की रचना में पाताल-दर-पाताल लाखों ही हैं तथा आकाश-दर-आकाश भी लाखों ही हैं। वेद-ग्रंथों में भी यही एक बात कही गई है कि ढूंढने वाले इसको अंतरिम छोर तक ढूंढ कर थक गए हैं किंतु इनका अंत किसी ने नहीं पाया है। सभी धर्म ग्रन्थों में अठ्ठारह हजार जगत् होने की बात कही गई है परंतु वास्तव में इनका मूल एक ही परमेश्वर है जो कि इनका स्रष्टा है। यदि उसकी सृष्टि का लेखा हो सके तो कोई लिखे, किंतु यह लेखा करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है। हे नानक! जिस सृजनहार को इस सम्पूर्ण जगत् में महान कहा जा रहा है वह स्वयं को स्वयं ही जानता है अथवा जान सकता है।
स्तुति करने वाले साधकों ने भी उस परमात्मा की स्तुति करके उसकी सीमा को नहीं पाया। जैसे नदियां-नाले समुद्र में मिलकर उसका अथाह अंत नहीं पा सकते, बल्कि अपना अस्तित्व भी खो लेते हैं, वैसे ही स्तुति करने वाले स्तुति करते-करते उसमें ही लीन हो जाते हैं। समुद्रों की शाह, शहंशाह होकर, पर्वत समान धन-सम्पत्ति के मालिक होकर भी, उस चींटी के समान नहीं हो सकते, यदि उनके मन से परमेश्वर विस्मृत नहीं हुआ होता।
उस निरंकार की स्तुति करने की कोई सीमा नहीं तथा कहने से भी उसकी प्रशंसा का अन्त नहीं हो सकता। सृजनहार द्वारा रची गई सृष्टि का भी कोई अन्त नहीं परंतु जब वह देता है तब भी उसका कोई अन्त नहीं है। उसके देखने व सुनने का भी अन्त नहीं है, अर्थात्-वह निरंकार सर्वद्रष्टा व सर्वश्रोता है। ईश्वर के हृदय का रहस्य क्या है, उसका बोध भी नहीं हो सकता। इस सृष्टि का प्रसार जो उसने किया उसकी अवधि अथवा सीमा को भी नहीं जाना जा सकता। उसके आदि व अन्त को भी नहीं जाना जा सकता। अनेकानेक जीव उसका अन्त पाने के लिए बिलखते फिर रहे हैं। किन्तु उस अथाह, अनन्त अकाल पुरुष का अंत नहीं पाया जा सकता। उसके गुणों का अन्त कहाँ होता है यह कोई नहीं जान सकता। उस पारब्रह्म की प्रशंसा, स्तुति, आकार अथवा गुणों को जितना कहा जाता है वह उतने ही अधिक होते जाते हैं। निरंकार सर्वश्रेष्ठ है, उसका स्थान सर्वोच्च है। किन्तु उस सर्वश्रेष्ठ निरंकार का नाम महानतम है। यदि कोई शक्ति उससे बड़ी अथवा ऊँची है, तो वह ही उस सर्वोच्च मालिक को जान सकती है। निरंकार अपना सर्वस्व स्वयं ही जानता है अथवा जान सकता है, अन्य कोई नहीं। सतिगुरु नानक देव जी का कथन है कि वह कृपासांगर जीवों पर करुणा करके उनके कर्मों के अनुसार उन्हें समस्त पदार्थ प्रदान करता है।
उसके उपकार इतने अधिक हैं कि उनको लिखने की समर्था किसी में भी नहीं। वह अनेक बख्शिशें करने वाला होने के कारण बड़ा है किंतु उसे लोभ तिनका मात्र भी नहीं है। कई अनगिनत शूरवीर उसकी कृपा-दृष्टि की चाहना रखते हैं। उनकी संख्या की तो बात ही नहीं हो सकती। कई मानव निरंकार द्वारा प्रदत पदार्थों को विकारों हेतु भोगने के लिए जूझ जूझ कर मर जाते हैं। कई अकाल पुरुष द्वारा दिए जाने वाले पदार्थों को लेकर मुकर जाते हैं। कई मूढ़ व्यक्ति परमात्मा से पदार्थ ले लेकर खाते रहते हैं, कभी उसे स्मरण नहीं करते। कइयों को दुख व भूख की मार सदैव पड़ती रहती है, क्योंकि यह उनके कर्मों में ही लिखा होता है। किन्तु ऐसे सज्जन ऐसी मार को उस परमात्मा की बख्शिश ही मानते हैं। इन्हीं कष्टों के कारण ही मानव जीव को वाहिगुरु का स्मरण होता है। मनुष्य को माया-मोह के बंधन से छुटकारा भी ईश्वर की आज्ञा में रहने से ही मिलता है। इसके लिए कोई अन्य विधि हो, कोई भी नहीं कह सकता; अर्थात्-ईश्वर की आज्ञा में रहने के अतिरिक्त माया के मोह-बंधन से छुटकारा पाने की कोई अन्य विधि कोई नहीं बता सकता। यदि अज्ञानता वश कोई व्यक्ति इसके बारे में कथन करने की चेष्टा करे तो फिर उसे ही मालूम पड़ेगा कि उसे अपने मुँह पर यमों आदि की कितनी चोटें खानी पड़ी हैं। परमात्मा संसार के समस्त प्राणियों की जरूरतों को जानता है और उन्हें स्वयं ही प्रदान भी करता है। संसार में सभी जीव कृतघ्न ही नहीं हैं, कई व्यक्ति ऐसे भी हैं जो इस बात को मानते हैं परमात्मा प्रसन्न होकर जिस व्यक्ति को अपनी स्तुति को गाने की शक्ति प्रदान करता है। हे नानक! वह बादशाहों का भी बादशाह हो जाता है; अर्थात् - उसे ऊँचा व उत्तम पद प्राप्त हो जाता है।
निरंकार के जिन गुणों को कथन नहीं किया जा सकता वे अमूल्य हैं, और इस निरंकार का सुमिरन अमूल्य व्यापार है। यह सुमिरन रूपी व्यापार का मार्गदर्शन करने वाले संत भी अमूल्य व्यापारी हैं और उन संतों के पास जो सगुणों का भण्डार है वह भी अमूल्य है। जो व्यक्ति इन संतों के पास प्रभु-मिलाप हेतु आते हैं वे भी अमूल्य हैं और इनसे जो गुण ले जाते हैं वे भी अमूल्य हैं। परस्पर गुरु-सिख का प्रेम अमूल्य है, गुरु के प्रेम से आत्मा को प्राप्त होने वाला आनंद भी अमूल्य है। अकाल-पुरुष का न्याय भी अमूल्य है, उसका न्यायालय भी अमूल्य है। अकाल पुरुष की न्याय करने वाली तुला अमूल्य है, और जीवों के अच्छे-बुरे कर्मों को तोलने हेतु परिमाण (तौल) भी अमूल्य है। अकाल पुरुष द्वारा प्रदान किए जाने वाले पदार्थ भी अमूल्य हैं और उन पदार्थों का चिन्ह भी अमूल्य है। निरंकार की जीव पर होने वाली कृपा भी अमूल्य है तथा उसका आदेश भी अमूल्य है। वह परमात्मा अति अमूल्य है उसका कथन घनिष्ठता से कर पाना असम्भव है। परंतु फिर भी अनेक भक्त जन उसके गुणों का व्याख्यान करके अर्थात् उसकी स्तुति कर-करके भूत, भविष्य व वर्तमान काल में उसमें लिवलीन हो रहे हैं। चारों वेद व अट्ठारह पुराणों में भी उसकी महिमा कही गई है। उनको पढ़ने वाले भी अकाल-पुरुष का व्याख्यान करते हैं । सृष्टिकर्ता ब्रह्मा व स्वर्गाधिपति इन्द्र भी उसके अमूल्य गुणों को कथन करते हैं। गिरिधर गोपाल कृष्ण तथा उसकी गोपियाँ भी उस निरंकार का गुणगान करती हैं। महादेव तथा गोरख आदि सिद्ध भी उसकी कीर्ति को कहते हैं। उस सृष्टिकर्ता ने इस जगत् में जितने भी बुद्धिमान किए हैं वे भी उसके यश को कहते हैं। समस्त दैत्य व देवतादि भी उसकी महिमा को कहते हैं। संसार के सभी पुण्य-कर्मी मानव, नारद आदि ऋषि-मुनि तथा अन्य भक्त जन उसकी प्रशंसा के गीत गाते हैं। कितने ही जीव वर्तमान में कह रहे हैं, तथा कितने ही भविष्य में कहने का यत्न करेंगे। कितने ही जीव भूतकाल में कहते हुए अपना जीवन समाप्त कर चुके हैं। इतने तो हम गिन चुके हैं यदि इतने ही और भी साथ मिला लिए जाएँ। तो भी कोई किसी साधन से उसकी अमूल्य स्तुति कह नहीं सकता। जितना स्व-विस्तार चाहता है उतना ही विस्तृत हो जाता है। श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं कि वह सत्य स्वरूप निरंकार ही अपने अमूल्य गुणों को जानता है। यदि कोई निरर्थक बोलने वाला परमेश्वर का अंत कहे कि वह इतना है तो उसे महामूखों में अंकित किया जाता है।
उस प्रतिपालक ईश्वर का द्वार तथा घर कैसा है, जहाँ बैठकर वह सम्पूर्ण सृष्टि को सम्भाल रहा है? (यहाँ पर सतिगुरु जी इस प्रश्न की निवृति में उत्तर देते हैं) हे मानव! उसके द्वार पर नाना प्रकार के असंख्य वादन गूंज रहे हैं और कितने ही उनको बजाने वाले विद्यमान हैं। कितने ही राग हैं जो रागिनियों के संग वहाँ गान किए जा रहे हैं और उन रागों को गाने वाले गंधर्व आदि रागी भी कितने ही हैं। उस निरंकार का यश पवन, जल तथा अग्नि देव गा रहे हैं तथा समस्त जीवों के कर्मों का विश्लेषक धर्मराज भी उसके द्वार पर खड़ा उसकी महिमा को गाता है। जीवों द्वारा किए जाने वाले कर्मों को लिखने वाले चित्र-गुप्त भी उस अकाल-पुरुष का यशोगान करते हैं तथा धर्मराज चित्रगुप्त द्वारा लिखे जाने वाले शुभाशुभ कर्मों का विचार करता है। परमात्मा द्वारा प्रतिपादित शिव, ब्रह्मा व उनकी देवियों (शक्ति) जो शोभायमान हैं, सदैव उसका स्तुति-गान करते हैं। हे निरंकार! समस्त देवताओं व स्वर्ग का अधिपति इन्द्र अपने सिंहासन पर बैठा अन्य देवताओं के साथ मिलकर तुम्हारे द्वार पर खड़ा तुम्हारा यश गा रहे हैं। सिद्ध लोग समाधियों में स्थित हुए तुम्हारा यश गाते हैं, जो विचारवान साधु हैं वे विवेक से यशोगान करते हैं। तुम्हारा स्तुतिगान यति, सती और संतोषी व्यक्ति भी गाते हैं तथा पराक्रमी योद्धा भी तुम्हारी महिमा का गान करते हैं। संसार के समस्त विद्वान व महान् जितेन्द्रिय ऋषि-मुनि युगों-युगों से वेदों को पढ़-पढ़ कर उस अकाल पुरुष का यशोगान कर रहे हैं। मन को मोह लेने वाली समस्त सुन्दर स्त्रियां स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक व पाताल लोक में तुम्हारा गुणगान कर रही हैं। निरंकार द्वारा उत्पन्न किए हुए चौदह रत्न, संसार के अठसठ तीर्थ तथा उन में विद्यमान संत जन (श्रेष्ठ जन) भी उसके यश को गाते हैं। सभी योद्धा, महाबली, शूरवीर अकाल पुरुष का यश गाते हैं, उत्पत्ति के चारों स्रोत (अण्डज, जरायुज, स्वेदज व उदभिज्ज) भी उसके गुणों को गाते हैं। नवखण्ड, मण्डल व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, जो उस सृजनहार ने बना-बना कर धारण कर रखे हैं, वे सभी तेरी स्तुति गाते हैं। वास्तव में वे ही तेरी कीर्ति को गा सकते हैं जो तेरी भक्ति में लीन हैं, तेरे नाम के रसिया हैं, और जो तुझे अच्छे लगते हैं। अनेकानेक और भी कई ऐसे जीव मुझे स्मरण नहीं हो रहे हैं, जो तुम्हारा यशोगान करते हैं, हे नानक! मैं कहाँ तक उनका विचार करूँ, अर्थात् यशोगान करने वाले जीवों की गणना मैं कहाँ तक करूँ। वह सत्यस्वरूप अकाल पुरुष भूतकाल में था, वही सगुणी निरंकार वर्तमान में भी है। वह भविष्य में सदैव रहेगा, वह सृजनहार परमात्मा न जन्म लेता है और न ही उसका नाश होता है। जिस सृष्टि रचयिता ईश्वर ने रंग-बिरंगी, तरह-तरह के आकार वाली व अनेकानेक जीवों की उत्पत्ति अपनी माया द्वारा की है। अपनी इस उत्पत्ति को कर-करके वह अपनी रुचि अनुसार ही देखता है अर्थात् उनकी देखभाल अपनी इच्छानुसार ही करता है। जो भी उस अकाल पुरुष को भला लगता है वही कार्य वह करता है और भविष्य में करेगा, इसके प्रति उसको आदेश करने वाला उसके समान कोई नहीं है। गुरु नानक जी का फुरमान है कि हे मानव! वह ईश्वर शाहों का शाह अर्थात् शहंशाह है, उसकी आज्ञा में रहना ही उचित है।
गुरु जी कहते हैं कि हे मानव योगी! तुम संतोष रूपी मुद्राएँ, दुष्कर्मों से लाज रूपी पात्र, पाप रहित होकर लोक-परलोक में बनाई जाने वाली प्रतिष्ठा रूपी चोली ग्रहण कर तथा शरीर को प्रभु की नाम-सिमरन रूपी विभूति लगाकर रख । मृत्यु का स्मरण करना तेरी गुदड़ी है, शरीर का पवित्र रहना योग की युक्ति है, अकाल पुरुष पर दृढ़ विश्वास तुम्हारा डण्डा है। इन सब सदाचारों को ग्रहण करना ही वास्तविक योगी भेष है। संसार के समस्त जीवों में तुम्हारा प्रेम हो अर्थात् उनके दुख-सुख को तुम अपना दुख-सुख अनुभव करो, यही तुम्हारा आई पंथ (योगियों का श्रेष्ठ पंथ) है। काम आदि विकारों से मन को जीत लेना जगत् पर विजय प्राप्त कर लेने के समान है। नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है।
हे मानव! निरंकार की सर्व-व्यापकता के ज्ञान का भण्डार होना तुम्हारा भोजन है, तुम्हारे हृदय की दया भण्डारिन होगी, क्योंकि दया-भाव रखने से ही सगुणों की प्राप्ति होती है। घट-घट में जो चेतन सत्ता प्रकट हो रही है वह नाद बजने के समान है। जिसने सम्पूर्ण सृष्टि को एक सूत्र में बांध रखा है, वही सृजनहार परमात्मा नाथ है, सभी ऋद्धियों-सिद्धियाँ अन्य प्रकार का स्वाद हैं। संयोग व वियोग रूपी नियम दोनों मिलकर इस सृष्टि का कार्य चला रहे हैं, कर्मानुसार ही जीवों को अपने-अपने भाग्य की प्राप्ति होती है। नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है।
एक ब्रह्म की किसी रहस्यमयी युक्ति द्वारा माया की प्रसूति से तीन पुत्र पैदा हुए। इन में से एक ब्रह्मा सृष्टि रचयिता, एक विष्णु संसार का पोषक, और एक शिव संहारक के रूप में दरबार लगाकर बैठ गया। जिस तरह उस अकाल पुरुष को भला लगता है उसी तरह वह इन तीनों को चलाता है और जैसा उसका आदेश होता है वैसा ही कार्य ये देव करते हैं। वह अकाल पुरुष तो इन तीनों को आदि व अन्त समय में देख रहा है किंतु इनको वह अदृश्य स्वरूप निरंकार नज़र नहीं आता, यह अत्याश्चर्यजनक बात है। नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है।
उसका आसन प्रत्येक लोक में है तथा प्रत्येक लोक में उसका भण्डार है। उस परमात्मा ने सभी भण्डारों को एक ही बार परिपूर्ण कर दिया है। वह सृजनहार रचना कर करके सृष्टि को देख रहा है। हे नानक! उस सत्यस्वरूप निरंकार की सम्पूर्ण रचना भी सत्य है। नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है।
एक जिव्हा से लाख जिव्हा हो जाएँ, फिर लाख से बीस लाख हो जाएँ। फिर एक-एक जिव्हा से लाख-लाख बार उस जगदीश्वर का एक नाम उच्चारण करें, अर्थात् निशदिन उस प्रभु का नाम सिमरन किया जाए। इस मार्ग से पति-परमेश्वर को मिलने हेतु बनी नाम रूपी सीढ़ियों पर चढ़ कर ही उस अद्वितीय प्रभु से मिलन हो सकता है। वैसे तो ब्रह्म-ज्ञानियों की बड़ी-बड़ी बातें सुनकर निकृष्ट जीव भी देहाभिमान में अनुकरण करने की इच्छा रखते हैं। परंतु गुरु नानक जी कहते हैं कि उस परमात्मा की प्राप्ति तो उसकी कृपा से ही होती है, वरन् ये तो मिथ्या लोगों की मिथ्या ही बातें है।
अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि के बिना इस जीव में कुछ भी कहने व चुप रहने की शक्ति नहीं है अर्थात् रसना को चला पाना जीव के वश में नहीं है। माँगने की भी इसमें ताकत नहीं है और न ही कुछ देने की समर्था है। यदि जीव चाहे कि मैं जीवित रहूँ तो भी इसमें बल नहीं है, क्योंकि कई बार मनुष्य उपचाराधीन ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, मरना भी उसके वश में नहीं है। धन, सम्पत्ति व वैभव प्राप्त करने में भी इस जीव का कोई बल है, जिन के लिए मन में जो जुनून होता है। श्रुति वेदों के ज्ञान का विचार करने का भीं इसमें बल नहीं है। संसार से मुक्त होने की षट्-शास्त्रों में दी गई युक्तियाँ धारण कर लेने की शक्ति भी इसमें नहीं है। जिस अकाल पुरुष के हाथ में ताकत है वही रचना करके देख रहा है। गुरु नानक जी कहते हैं कि फिर तो यही जानना चाहिए कि इस संसार में न कोई स्वेच्छा से नीच है, न उत्तम है, वह प्रभु जिस को कर्मानुसार जैसा रखता है वैसा ही वह रहता है।
रात्रियों, ऋतुओं, तिथियों, सप्ताह के वारों, वायु, जल, अग्नि व पाताल आदि यावत प्रपंच हैं। स्रष्टा प्रभु ने उस में पृथ्वी रूपी धर्मशाला स्थापित करके रखी हुई है, इसी को कर्मभूमि कहते हैं। उस धर्मशाला में नाना प्रकार के जीव हैं, जिनकी अनेक भांति की धर्म-कर्म की उपासना की युक्ति है और उनके श्वेत-श्यामादि अनेक प्रकार के वर्ण हैं। उनके अनेक प्रकार के अनंत नाम हैं। संसार में विचरन कर रहे उन अनेकानेक जीवों को अपने शुभाशुभकर्मों के अनुसार ही उन पर विचार किया जाता है। विचार करने वाला वह निरंकार स्वयं भी सत्य है और उसका दरबार भी सत्य है। वही उसके दरबार में शोभायमान होते हैं जो प्रामाणिक संत हैं, जिनके माथे पर कृपालु परमात्मा की कृपा का चिन्ह अंकित होता है। प्रभु के दरबार में कच्चे-पक्के होने का परीक्षण होता है। हे नानक! इस तथ्य का निर्णय वहाँ जाकर ही होता है।
(कर्मकाण्ड में) धर्मखण्ड का यही नियम है; जो पूर्व पंक्तियों में कथन किया गया है। (गुरु नानक जी) अब ज्ञान खण्ड का व्यवहार वर्णन करते हैं। (इस संसार में) कितने प्रकार के पवन, जल, अग्नि हैं, और कितने ही रूप कृष्ण व रुद्र (शिव) के हैं। कितने ही ब्रह्मा इस सृष्टि में अनेकानेक रूप-रंगों के भेष में जीव पैदा करते हैं। कितनी ही कर्म भूमियों, सुमेर पर्वत, धुव भक्त व उनके उपदेष्टा हैं। इन्द्र व चंद्रमा भी कितने हैं, कितने ही सूर्य, कितने ही मण्डल व मण्डलांतर्गत देश हैं। कितने ही सिद्ध, विद्वान व नाथ हैं, कितने ही देवियों के स्वरूप हैं। कितने ही देव, दैत्य व मुनि हैं और रत्नों से भरपूर कितने ही समुद्र हैं। कितने ही उत्पत्ति के स्रोत हैं (अण्डज-जरायुजादि), कितनी प्रकार की वाणी है (परा, पश्यन्ती आदि) कितने ही बादशाह हैं और कितने ही राजा हैं। कितनी ही वेद-श्रुतियाँ हैं, उनके सेवक भी कितने ही हैं। गुरु नानक जी कहते हैं कि उसकी रचना का कोई अन्त नहीं है; इन सबके अन्त का बोध ज्ञान-खण्ड में जाने से होता है, जहाँ पर जीव ज्ञानयान हो जाता है।
ज्ञान खण्ड में जो ज्ञान कथन किया है वह प्रबल है। इस खण्ड में रागमयी, प्रसन्नतापूर्ण व कौतुकी आनंद विद्यमान है। (श्रम खंड में परमेश्वर की भक्ति को प्रभुख माना गया है) परमेश्वर की भक्ति करने का उद्यम करने वाले संतजनों की वाणी मधुर है। वहाँ (श्रम खण्ड में) पर अद्वितीय सुन्दरता वाले स्वरूप की गढ़न की जाती है। उनकी बातों का कथन नहीं किया जा सकता। यदि कोई उनकी महिमा कथन करने की चेष्टा करता भी है तो उसे बाद में पछताना पड़ता है। वहाँ पर वेद-श्रुति, ज्ञान, मन और बुद्धि गढ़े जाते हैं। वहाँ पर दिव्य बुद्धि वाले देवों व सिद्ध अवस्था की प्राप्ति वाली सूझ गढ़ी जाती है।
जिन उपासकों पर परमेश्वर की कृपा हुई उनकी वाणी शक्तिवान हो जाती है। जहाँ पर ये उपासक विद्यमान होते हैं वहाँ पर कोई और नहीं होता। उन उपासकों में देह को जीतने वाले योद्धा, इन्द्रियों को जीतने वाले महाबली तथा मन को जीतने वाले शूरवीर होते हैं। उन में प्रभु राम परिपूर्ण रहते हैं। उन निर्गुण स्वरूप राम के साथ महिमा रूपी सीता चन्द्रमा समान प्रकाशमान व मन को शीतल करने वाली है। ऐसा स्वरूप प्राप्त करने वालों के गुण कथन नहीं किए जा सकते। वे उपासक न तो मरते हैं और न ही ठगे जाते हैं, जिनके हृदय में परमात्मा राम का स्वरूप विद्यमान होता है। वहाँ कई लोकों के भक्त निवास करते हैं। जिनके हृदय में सत्यस्वरूप निरंकार वास करता है, वे आनंद प्राप्त करते हैं। सत्य धारण करने वालों के हृदयं (सचखण्ड) में वह निरंकार निवास करता है; अर्थात् वैकुण्ठ लोक, जहाँ सहुणी व्यक्तियों का वास हैं, में वह सर्गुण स्वरूप परमात्मा रहता है। यह सृजनहार परमात्मा अपनी सृजना को रच-रचकर कृपा-दृष्टि से देखता है अर्थात् उसका पोषण करता है। उस सुचखण्ड में अनन्त ही खण्ड, मण्डल व ब्रह्माण्ड है। यदि कोई उसके अन्त को कथन करे तो अन्त नहीं पा सकता, क्योंकि वह असीम है। वहाँ अनेकानेक लोक विद्यमान है और उनमें रहने वालों के अस्तित्व भी अनेक हैं। फिर जिस तरह वह सर्वशक्तिमान परमात्मा आदेश करता है उसी तरह वे कार्य करते हैं। अपने इस रचे हुए प्रपंच को देख कर व शुभाशुभ कर्मों को विचार कर वह प्रसन्न होता है। गुरु नानक जी कहते हैं कि उस निरंकार के मूल-तत्व का जो मैंने उल्लेख किया है उसे कथन करना अत्यंत कठिन है।
इद्रिय-निग्रह रूपी भट्ठी हो, संयम रूपी सुनार हो। अचल बुद्धि रूपी अहरन हो, गुरु ज्ञान रूपी हथौड़ा हो। निरंकार के भय को धौंकनी तथा तपोमय जीवन को अग्नि ताप बनाओ। हृदय - प्रेम को बर्तन बनाकर उसमें नाम अमृत को गलाया जाए। इसी सच्ची टकसाल में नैतिक जीवन को गढ़ा जाता है। अर्थात् ऐसी टकसाल से ही सद् गुणी जीवन बनाया जा सकता है। जिन पर अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि होती है, उन्हीं को ये कार्य करने को मिलते हैं। हे नानक! ऐसे सद् गुणी जीव उस कृपासागर परमात्मा की कृपा-दृष्टि के कारण कृतार्थ होते हैं।
सलोक ।। समस्त सृष्टि का गुरु पवन है, पानी पिता है, और पृथ्वी बड़ी माता है। दिन और रात दोनों धाय एवं धीया (बच्चों को खिलाने वाले) के समान हैं तथा सम्पूर्ण जगत् इन दोनों की गोद में खेल रहा है। शुभ व अशुभ कर्मों का विवेचन उस अकाल-पुरुष के दरबार में होगा। अपने शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप ही जीव परमात्मा के निकट अथवा दूर होता है। जिन्होंने प्रभु का नाम-सुमिरन किया है, वे जप-तप आदि की गई मेहनत को सफल कर गए हैं। गुरु नानक देव जी कथन करते हैं कि ऐसे स‌द्राणियों के मुख उज्ज्वल हुए हैं और कितने ही जीव उनके साथ, अर्थात् उनका अनुसरण करके, आवागमन के चक्र से मुक्त हो गए हैं।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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