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जपजी साहिब • अध्याय 1 • श्लोक 29
ਅਮੁਲ ਗੁਣ ਅਮੁਲ ਵਾਪਾਰ ॥ ਅਮੁਲ ਵਾਪਾਰੀਏ ਅਮੁਲ ਭੰਡਾਰ ॥ ਅਮੁਲ ਆਵਹਿ ਅਮੁਲ ਲੈ ਜਾਹਿ ॥ ਅਮੁਲ ਭਾਇ ਅਮੁਲਾ ਸਮਾਹਿ ॥ ਅਮੁਲੁ ਧਰਮੁ ਅਮੁਲੁ ਦੀਬਾਣੁ ॥ ਅਮੁਲੁ ਤੁਲੁ ਅਮੁਲੁ ਪਰਵਾਣੁ ॥ ਅਮੁਲੁ ਬਖਸੀਸ ਅਮੁਲੁ ਨੀਸਾਣੁ ॥ ਅਮੁਲੁ ਕਰਮੁ ਅਮੁਲੁ ਫੁਰਮਾਣੁ ॥ ਅਮੁਲੋ ਅਮੁਲੁ ਆਖਿਆ ਨ ਜਾਇ ॥ ਆਖਿ ਆਖਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥ ਆਖਹਿ ਵੇਦ ਪਾਠ ਪੁਰਾਣ ॥ ਆਖਹਿ ਪੜੇ ਕਰਹਿ ਵਖਿਆਣ ॥ ਆਖਹਿ ਬਰਮੇ ਆਖਹਿ ਇੰਦ ॥ ਆਖਹਿ ਗੋਪੀ ਤੈ ਗੋਵਿੰਦ ॥ ਆਖਹਿ ਈਸਰ ਆਖਹਿ ਸਿਧ ॥ ਆਖਹਿ ਕੇਤੇ ਕੀਤੇ ਬੁਧ ॥ ਆਖਹਿ ਦਾਨਵ ਆਖਹਿ ਦੇਵ ॥ ਆਖਹਿ ਸੁਰਿ ਨਰ ਮੁਨਿ ਜਨ ਸੇਵ ॥ ਕੇਤੇ ਆਖਹਿ ਆਖਣਿ ਪਾਹਿ ॥ ਕੇਤੇ ਕਹਿ ਕਹਿ ਉਠਿ ਉਠਿ ਜਾਹਿ ॥ ਏਤੇ ਕੀਤੇ ਹੋਰਿ ਕਰੇਹਿ ॥ ਤਾ ਆਖਿ ਨ ਸਕਹਿ ਕੇਈ ਕੇਇ ॥ ਜੇਵਡੁ ਭਾਵੈ ਤੇਵਡੁ ਹੋਇ ॥ ਨਾਨਕ ਜਾਣੈ ਸਾਚਾ ਸੋਇ ॥ ਜੇ ਕੋ ਆਖੈ ਬੋਲੁਵਿਗਾੜੁ ॥ ਤਾ ਲਿਖੀਐ ਸਿਰਿ ਗਾਵਾਰਾ ਗਾਵਾਰੁ ॥
निरंकार के जिन गुणों को कथन नहीं किया जा सकता वे अमूल्य हैं, और इस निरंकार का सुमिरन अमूल्य व्यापार है। यह सुमिरन रूपी व्यापार का मार्गदर्शन करने वाले संत भी अमूल्य व्यापारी हैं और उन संतों के पास जो सगुणों का भण्डार है वह भी अमूल्य है। जो व्यक्ति इन संतों के पास प्रभु-मिलाप हेतु आते हैं वे भी अमूल्य हैं और इनसे जो गुण ले जाते हैं वे भी अमूल्य हैं। परस्पर गुरु-सिख का प्रेम अमूल्य है, गुरु के प्रेम से आत्मा को प्राप्त होने वाला आनंद भी अमूल्य है। अकाल-पुरुष का न्याय भी अमूल्य है, उसका न्यायालय भी अमूल्य है। अकाल पुरुष की न्याय करने वाली तुला अमूल्य है, और जीवों के अच्छे-बुरे कर्मों को तोलने हेतु परिमाण (तौल) भी अमूल्य है। अकाल पुरुष द्वारा प्रदान किए जाने वाले पदार्थ भी अमूल्य हैं और उन पदार्थों का चिन्ह भी अमूल्य है। निरंकार की जीव पर होने वाली कृपा भी अमूल्य है तथा उसका आदेश भी अमूल्य है। वह परमात्मा अति अमूल्य है उसका कथन घनिष्ठता से कर पाना असम्भव है। परंतु फिर भी अनेक भक्त जन उसके गुणों का व्याख्यान करके अर्थात् उसकी स्तुति कर-करके भूत, भविष्य व वर्तमान काल में उसमें लिवलीन हो रहे हैं। चारों वेद व अट्ठारह पुराणों में भी उसकी महिमा कही गई है। उनको पढ़ने वाले भी अकाल-पुरुष का व्याख्यान करते हैं । सृष्टिकर्ता ब्रह्मा व स्वर्गाधिपति इन्द्र भी उसके अमूल्य गुणों को कथन करते हैं। गिरिधर गोपाल कृष्ण तथा उसकी गोपियाँ भी उस निरंकार का गुणगान करती हैं। महादेव तथा गोरख आदि सिद्ध भी उसकी कीर्ति को कहते हैं। उस सृष्टिकर्ता ने इस जगत् में जितने भी बुद्धिमान किए हैं वे भी उसके यश को कहते हैं। समस्त दैत्य व देवतादि भी उसकी महिमा को कहते हैं। संसार के सभी पुण्य-कर्मी मानव, नारद आदि ऋषि-मुनि तथा अन्य भक्त जन उसकी प्रशंसा के गीत गाते हैं। कितने ही जीव वर्तमान में कह रहे हैं, तथा कितने ही भविष्य में कहने का यत्न करेंगे। कितने ही जीव भूतकाल में कहते हुए अपना जीवन समाप्त कर चुके हैं। इतने तो हम गिन चुके हैं यदि इतने ही और भी साथ मिला लिए जाएँ। तो भी कोई किसी साधन से उसकी अमूल्य स्तुति कह नहीं सकता। जितना स्व-विस्तार चाहता है उतना ही विस्तृत हो जाता है। श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं कि वह सत्य स्वरूप निरंकार ही अपने अमूल्य गुणों को जानता है। यदि कोई निरर्थक बोलने वाला परमेश्वर का अंत कहे कि वह इतना है तो उसे महामूखों में अंकित किया जाता है।
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