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जपजी साहिब • अध्याय 1 • श्लोक 28
ਬਹੁਤਾ ਕਰਮੁ ਲਿਖਿਆ ਨਾ ਜਾਇ ॥ ਵਡਾ ਦਾਤਾ ਤਿਲੁ ਨ ਤਮਾਇ ॥ ਕੇਤੇ ਮੰਗਹਿ ਜੋਧ ਅਪਾਰ ॥ ਕੇਤਿਆ ਗਣਤ ਨਹੀ ਵੀਚਾਰੁ ॥ ਕੇਤੇ ਖਪਿ ਤੁਟਹਿ ਵੇਕਾਰ ॥ ਕੇਤੇ ਲੈ ਲੈ ਮੁਕਰੁ ਪਾਹਿ ॥ ਕੇਤੇ ਮੂਰਖ ਖਾਹੀ ਖਾਹਿ ॥ ਕੇਤਿਆ ਦੂਖ ਭੂਖ ਸਦ ਮਾਰ ॥ ਏਹਿ ਭਿ ਦਾਤਿ ਤੇਰੀ ਦਾਤਾਰ ॥ ਬੰਦਿ ਖਲਾਸੀ ਭਾਣੈ ਹੋਇ ॥ ਹੋਰੁ ਆਖਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਇ ॥ ਜੇ ਕੋ ਖਾਇਕੁ ਆਖਣਿ ਪਾਇ ॥ ਓਹੁ ਜਾਣੈ ਜੇਤੀਆ ਮੁਹਿ ਖਾਇ ॥ ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਆਪੇ ਦੇਇ ॥ ਆਖਹਿ ਸਿ ਭਿ ਕੇਈ ਕੇਇ ॥ ਜਿਸ ਨੋ ਬਖਸੇ ਸਿਫਤਿ ਸਾਲਾਹ ॥ ਨਾਨਕ ਪਾਤਿਸਾਹੀ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ॥
उसके उपकार इतने अधिक हैं कि उनको लिखने की समर्था किसी में भी नहीं। वह अनेक बख्शिशें करने वाला होने के कारण बड़ा है किंतु उसे लोभ तिनका मात्र भी नहीं है। कई अनगिनत शूरवीर उसकी कृपा-दृष्टि की चाहना रखते हैं। उनकी संख्या की तो बात ही नहीं हो सकती। कई मानव निरंकार द्वारा प्रदत पदार्थों को विकारों हेतु भोगने के लिए जूझ जूझ कर मर जाते हैं। कई अकाल पुरुष द्वारा दिए जाने वाले पदार्थों को लेकर मुकर जाते हैं। कई मूढ़ व्यक्ति परमात्मा से पदार्थ ले लेकर खाते रहते हैं, कभी उसे स्मरण नहीं करते। कइयों को दुख व भूख की मार सदैव पड़ती रहती है, क्योंकि यह उनके कर्मों में ही लिखा होता है। किन्तु ऐसे सज्जन ऐसी मार को उस परमात्मा की बख्शिश ही मानते हैं। इन्हीं कष्टों के कारण ही मानव जीव को वाहिगुरु का स्मरण होता है। मनुष्य को माया-मोह के बंधन से छुटकारा भी ईश्वर की आज्ञा में रहने से ही मिलता है। इसके लिए कोई अन्य विधि हो, कोई भी नहीं कह सकता; अर्थात्-ईश्वर की आज्ञा में रहने के अतिरिक्त माया के मोह-बंधन से छुटकारा पाने की कोई अन्य विधि कोई नहीं बता सकता। यदि अज्ञानता वश कोई व्यक्ति इसके बारे में कथन करने की चेष्टा करे तो फिर उसे ही मालूम पड़ेगा कि उसे अपने मुँह पर यमों आदि की कितनी चोटें खानी पड़ी हैं। परमात्मा संसार के समस्त प्राणियों की जरूरतों को जानता है और उन्हें स्वयं ही प्रदान भी करता है। संसार में सभी जीव कृतघ्न ही नहीं हैं, कई व्यक्ति ऐसे भी हैं जो इस बात को मानते हैं परमात्मा प्रसन्न होकर जिस व्यक्ति को अपनी स्तुति को गाने की शक्ति प्रदान करता है। हे नानक! वह बादशाहों का भी बादशाह हो जाता है; अर्थात् - उसे ऊँचा व उत्तम पद प्राप्त हो जाता है।
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