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जपजी साहिब • अध्याय 1 • श्लोक 34
ਆਸਣੁ ਲੋਇ ਲੋਇ ਭੰਡਾਰ ॥ ਜੋ ਕਿਛੁ ਪਾਇਆ ਸੁ ਏਕਾ ਵਾਰ ॥ ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ॥ ਨਾਨਕ ਸਚੇ ਕੀ ਸਾਚੀ ਕਾਰ ॥ ਆਦੇਸੁ ਤਿਸੈ ਆਦੇਸੁ ॥ ਆਦਿ ਅਨੀਲੁ ਅਨਾਦਿ ਅਨਾਹਤਿ ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਏਕੋ ਵੇਸੁ ॥
उसका आसन प्रत्येक लोक में है तथा प्रत्येक लोक में उसका भण्डार है। उस परमात्मा ने सभी भण्डारों को एक ही बार परिपूर्ण कर दिया है। वह सृजनहार रचना कर करके सृष्टि को देख रहा है। हे नानक! उस सत्यस्वरूप निरंकार की सम्पूर्ण रचना भी सत्य है। नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है।
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