कोई उसे अपने अंग-संग जानकर उसकी महिमा गाता है। अनेकानेक ने उसकी कीर्ति का कथन किया है किन्तु फिर अन्त नहीं हुआ।
करोड़ों जीवों ने उसके गुणों का कथन किया है, फिर भी-उसका वास्तविक स्वरूप पाया नहीं जा सका।
अकाल पुरुष दाता बनकर जीव को भौतिक पदार्थ (अथक) देता ही जा रहा है, (परंतु) जीव लेते हुए थक जाता है। समस्त जीव युगों-युगों से इन पदार्थों का भोग करते आ रहे हैं।
आदेश करने वाले निरंकार की इच्छा से ही (सम्पूर्ण सृष्टि के) मार्ग चल रहे हैं।
श्री गुरु नानक देव जी सृष्टि के जीवों को सुचेत करते हुए कहते हैं कि वह निरंकार (वाहिगुरु) चिंता रहित होकर (इस संसार के जीवों पर) सदैव प्रसन्न रहता है।
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