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जपजी साहिब • अध्याय 1 • श्लोक 19
ਪੰਚ ਪਰਵਾਣ ਪੰਚ ਪਰਧਾਨੁ ॥ ਪੰਚੇ ਪਾਵਹਿ ਦਰਗਹਿ ਮਾਨੁ ॥ ਪੰਚੇ ਸੋਹਹਿ ਦਰਿ ਰਾਜਾਨੁ ॥ ਪੰਚਾ ਕਾ ਗੁਰੁ ਏਕੁ ਧਿਆਨੁ ॥ ਜੇ ਕੋ ਕਹੈ ਕਰੈ ਵੀਚਾਰੁ ॥ ਕਰਤੇ ਕੈ ਕਰਣੈ ਨਾਹੀ ਸੁਮਾਰੁ ॥ ਧੌਲੁ ਧਰਮੁ ਦਇਆ ਕਾ ਪੂਤੁ ॥ ਸੰਤੋਖੁ ਥਾਪਿ ਰਖਿਆ ਜਿਨਿ ਸੂਤਿ ॥ ਜੇ ਕੋ ਬੁਝੈ ਹੋਵੈ ਸਚਿਆਰੁ ॥ ਧਵਲੈ ਉਪਰਿ ਕੇਤਾ ਭਾਰੁ ॥ ਧਰਤੀ ਹੋਰੁ ਪਰੈ ਹੋਰੁ ਹੋਰੁ ॥ ਤਿਸ ਤੇ ਭਾਰੁ ਤਲੈ ਕਵਣੁ ਜੋਰੁ ॥ ਜੀਅ ਜਾਤਿ ਰੰਗਾ ਕੇ ਨਾਵ ॥ ਸਭਨਾ ਲਿਖਿਆ ਵੁੜੀ ਕਲਾਮ ॥ ਏਹੁ ਲੇਖਾ ਲਿਖਿ ਜਾਣੈ ਕੋਇ ॥ ਲੇਖਾ ਲਿਖਿਆ ਕੇਤਾ ਹੋਇ ॥ ਕੇਤਾ ਤਾਣੁ ਸੁਆਲਿਹੁ ਰੂਪੁ ॥ ਕੇਤੀ ਦਾਤਿ ਜਾਣੈ ਕੌਣੁ ਕੂਤੁ ॥ ਕੀਤਾ ਪਸਾਉ ਏਕੋ ਕਵਾਉ ॥ ਤਿਸ ਤੇ ਹੋਏ ਲਖ ਦਰੀਆਉ ॥ ਕੁਦਰਤਿ ਕਵਣ ਕਹਾ ਵੀਚਾਰੁ ॥ ਵਾਰਿਆ ਨ ਜਾਵਾ ਏਕ ਵਾਰ ॥ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸਾਈ ਭਲੀ ਕਾਰ ॥ ਤੂ ਸਦਾ ਸਲਾਮਤਿ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
जिन्होंने प्रभु-नांम का चिन्तन किया है वे श्रेष्ठ संतजन निरंकार के द्वार पर स्वीकृत होते हैं, हैं, वे ही वहाँ पर प्रभुख होते हैं। ऐसे गुरुमुख प्यारे अकाल पुरुष की सभा में सम्मान पाते हैं। ऐसे सद्-पुरुष राज दरबार में शोभावान होते हैं। सगुणी मानव का ध्यान उस एक सतगुरु (निरंकार) में ही दृढ़ रहता है। यदि कोई व्यक्ति उस सृजनहार के बारे में कहना चाहे अथवा उसकी रचना का लेखा करे तो उस रचयिता की कुदरत का आकलन नहीं किया जा सकता। निरंकार द्वारा रची गई सृष्टि धर्म रूपी वृषभ (धौला बैल) ने अपने ऊपर टिका कर रखी हुई है जो कि दया का पुत्र है (क्योंकि मन में दया-भाव होगा तभी धर्म-कार्य इस मानव जीव से सम्भव होगा।) जिसे संतोष रूपी सूत्र के साथ बांधा हुआ है। यदि कोई परमात्मा के इस रहस्य को जान ले तो वह सत्यनिष्ठ हो सकता है। यदि कोई ईश्वर के इस कौतुक को नहीं मानता तो उसके मन में यही शंका उत्पन्न होगी कि उस शरीर धारी बैल पर इस धरती का कितना बोझ है, वह कितना बोझ उठाने की समर्था रखता है। क्योंकि इस धरती पर सृजनहार ने जो रचना की है वह परे से परे है, अनन्त है। फिर उस बैल का बोझ किस शक्ति पर आश्रित है। सृजनहार की इस रचना में अनेक जातियों, रंगों तथा अलग-अलग नाम से जाने जाने वाले लोग मौजूद हैं। जिनके मस्तिष्क पर परमात्मा की आज्ञा में चलने वाली कलम से कर्मो का लेखा लिखा गया है। किन्तु यदि कोई जन-साधारण इस कर्म-लेख को लिखने की बात कहे तो वह यह भी नहीं जान पाएगा कि यह लिखा जाने वाला लेखा कितना होगा। लिखने वाले उस परमात्मा में कितनी शक्ति होगी, उसका रूप कितना सुन्दर है। उसकी कितनी दात है, ऐसा कौन है जो उसका सम्पूर्ण अनुमान लगा सकता है। अकाल पुरुष के मात्र एक शब्द से समस्त सृष्टि का प्रसार हुआ है। उस एक शब्द रूपी आदेश से ही सृष्टि में एक से अनेक जीव-जन्तु, तथा अन्य पदार्थों के प्रवाह चल पड़े हैं। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्था का विचार कर सकूं। हे अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार! हे पारब्रह्म! तू सदा शाश्वत रूप हैं।
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