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जपजी साहिब • अध्याय 1 • श्लोक 27
ਅੰਤੁ ਨ ਸਿਫਤੀ ਕਹਣਿ ਨ ਅੰਤੁ ॥ ਅੰਤੁ ਨ ਕਰਣੈ ਦੇਣਿ ਨ ਅੰਤੁ ॥ ਅੰਤੁ ਨ ਵੇਖਣਿ ਸੁਣਣਿ ਨ ਅੰਤੁ ॥ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਪੈ ਕਿਆ ਮਨਿ ਮੰਤੁ ॥ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਪੈ ਕੀਤਾ ਆਕਾਰੁ ॥ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਪੈ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥ ਅੰਤ ਕਾਰਣਿ ਕੇਤੇ ਬਿਲਲਾਹਿ ॥ ਤਾ ਕੇ ਅੰਤ ਨ ਪਾਏ ਜਾਹਿ ॥ ਏਹੁ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਣੈ ਕੋਇ ॥ ਬਹੁਤਾ ਕਹੀਐ ਬਹੁਤਾ ਹੋਇ ॥ ਵਡਾ ਸਾਹਿਬੁ ਊਚਾ ਥਾਉ ॥ ਊਚੇ ਉਪਰਿ ਊਚਾ ਨਾਉ ॥ ਏਵਡੁ ਊਚਾ ਹੋਵੈ ਕੋਇ ॥ ਤਿਸੁ ਊਚੇ ਕਉ ਜਾਣੈ ਸੋਇ ॥ ਜੇਵਡੁ ਆਪਿ ਜਾਣੈ ਆਪਿ ਆਪਿ ॥ ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਕਰਮੀ ਦਾਤਿ ॥
उस निरंकार की स्तुति करने की कोई सीमा नहीं तथा कहने से भी उसकी प्रशंसा का अन्त नहीं हो सकता। सृजनहार द्वारा रची गई सृष्टि का भी कोई अन्त नहीं परंतु जब वह देता है तब भी उसका कोई अन्त नहीं है। उसके देखने व सुनने का भी अन्त नहीं है, अर्थात्-वह निरंकार सर्वद्रष्टा व सर्वश्रोता है। ईश्वर के हृदय का रहस्य क्या है, उसका बोध भी नहीं हो सकता। इस सृष्टि का प्रसार जो उसने किया उसकी अवधि अथवा सीमा को भी नहीं जाना जा सकता। उसके आदि व अन्त को भी नहीं जाना जा सकता। अनेकानेक जीव उसका अन्त पाने के लिए बिलखते फिर रहे हैं। किन्तु उस अथाह, अनन्त अकाल पुरुष का अंत नहीं पाया जा सकता। उसके गुणों का अन्त कहाँ होता है यह कोई नहीं जान सकता। उस पारब्रह्म की प्रशंसा, स्तुति, आकार अथवा गुणों को जितना कहा जाता है वह उतने ही अधिक होते जाते हैं। निरंकार सर्वश्रेष्ठ है, उसका स्थान सर्वोच्च है। किन्तु उस सर्वश्रेष्ठ निरंकार का नाम महानतम है। यदि कोई शक्ति उससे बड़ी अथवा ऊँची है, तो वह ही उस सर्वोच्च मालिक को जान सकती है। निरंकार अपना सर्वस्व स्वयं ही जानता है अथवा जान सकता है, अन्य कोई नहीं। सतिगुरु नानक देव जी का कथन है कि वह कृपासांगर जीवों पर करुणा करके उनके कर्मों के अनुसार उन्हें समस्त पदार्थ प्रदान करता है।
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