वह परमात्मा किसी के द्वारा मूर्त रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता, न ही उसे बनाया जा सकता है। वह मायातीत होकर स्वयं से ही प्रकाशमान है। जिस मानव ने उस ईश्वर का नाम-स्मरण किया है उसी ने उसके दरबार में सम्मान प्राप्त किया है।
श्री गुरु नानक देव जी का कथन है कि उस गुणों के भण्डार निरंकार की बंदगी करनी चाहिए। उसका गुणगान करते हुए, प्रशंसा सुनते हुए अपने हृदय में उसके प्रति श्रद्धा धारण करें। ऐसा करने से दुखों का नाश होकर घर में सुखों का वास हो जाता है।
गुरु के मुँह से निकला हुआ शब्द ही वेदों का ज्ञान है, वही उपदेश रूपी ज्ञान सभी जगह विद्यमान है। गुरु ही शिव, विष्णु, ब्रह्मा और माता पार्वती है, क्योंकि गुरु परम शक्ति हैं।
यदि मैं उस सर्गुण स्वरूप परमात्मा के बारे में जानता भी हूँ तो उसे कथन नहीं कर सकता, क्योंकि उसका कथन किया ही नहीं जा सकता। हे सच्चे गुरु! मुझे सिर्फ यही समझा दो कि समस्त जीवों का जो एकमात्र दाता है मैं कभी भी उसे भूल न पाऊं।
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