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जपजी साहिब • अध्याय 1 • श्लोक 18
ਮੰਨੈ ਪਾਵਹਿ ਮੋਖੁ ਦੁਆਰੁ ॥ ਮੰਨੈ ਪਰਵਾਰੈ ਸਾਧਾਰੁ ॥ ਮੰਨੈ ਤਰੈ ਤਾਰੇ ਗੁਰੁ ਸਿਖ ॥ ਮੰਨੈ ਨਾਨਕ ਭਵਹਿ ਨ ਭਿਖ ॥ ਐਸਾ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਹੋਇ ॥ ਜੇ ਕੋ ਮੰਨਿ ਜਾਣੈ ਮਨਿ ਕੋਇ ॥
प्रभु के नाम का चिन्तन करने वाले मनुष्य मोक्ष द्वार को प्राप्त कर लेते हैं। चिन्तन करने वाले अपने समस्त परिजनों को भी उस नाम का आश्रय देते हैं। चिन्तनशील गुरसिख स्वयं तो इस भव-सांगर को पार करता ही है तथा अन्य संगियों को भी पार करवा देता है। चिन्तन करने वाला मानव जीव, हे नानक ! दर-दर का भिखारी नहीं बनता। परमात्मा का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है। यदि कोई उसे अपने हृदय में लीन करके उसका चिन्तन करे।
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