गुरु जी कहते हैं कि हे मानव योगी! तुम संतोष रूपी मुद्राएँ, दुष्कर्मों से लाज रूपी पात्र, पाप रहित होकर लोक-परलोक में बनाई जाने वाली प्रतिष्ठा रूपी चोली ग्रहण कर तथा शरीर को प्रभु की नाम-सिमरन रूपी विभूति लगाकर रख । मृत्यु का स्मरण करना तेरी गुदड़ी है, शरीर का पवित्र रहना योग की युक्ति है, अकाल पुरुष पर दृढ़ विश्वास तुम्हारा डण्डा है। इन सब सदाचारों को ग्रहण करना ही वास्तविक योगी भेष है। संसार के समस्त जीवों में तुम्हारा प्रेम हो अर्थात् उनके दुख-सुख को तुम अपना दुख-सुख अनुभव करो, यही तुम्हारा आई पंथ (योगियों का श्रेष्ठ पंथ) है। काम आदि विकारों से मन को जीत लेना जगत् पर विजय प्राप्त कर लेने के समान है।
नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है।
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