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जपजी साहिब • अध्याय 1 • श्लोक 20
ਅਸੰਖ ਜਪ ਅਸੰਖ ਭਾਉ ॥ ਅਸੰਖ ਪੂਜਾ ਅਸੰਖ ਤਪ ਤਾਉ ॥ ਅਸੰਖ ਗਰੰਥ ਮੁਖਿ ਵੇਦ ਪਾਠ ॥ ਅਸੰਖ ਜੋਗ ਮਨਿ ਰਹਹਿ ਉਦਾਸ ॥ ਅਸੰਖ ਭਗਤ ਗੁਣ ਗਿਆਨ ਵੀਚਾਰ ॥ ਅਸੰਖ ਸਤੀ ਅਸੰਖ ਦਾਤਾਰ ॥ ਅਸੰਖ ਸੂਰ ਮੁਹ ਭਖ ਸਾਰ ॥ ਅਸੰਖ ਮੋਨਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ਤਾਰ ॥ ਕੁਦਰਤਿ ਕਵਣ ਕਹਾ ਵੀਚਾਰੁ ॥ ਵਾਰਿਆ ਨ ਜਾਵਾ ਏਕ ਵਾਰ ॥ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸਾਈ ਭਲੀ ਕਾਰ ॥ ਤੂ ਸਦਾ ਸਲਾਮਤਿ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
इस सृष्टि में असंख्य लोग उस सृजनहार का जाप करते हैं, असंख्य ही उसको प्रीत करने वाले हैं। असंख्य उसकी अर्चना करते हैं, असंख्य तपी तपस्या कर रहे है। असंख्य लोग धार्मिक ग्रंथों व वेदों आदि का मुंह द्वारा पाठ कर रहे हैं। असंख्य ही योग-साधना में लीन रह कर मन को आसक्तियों से मुक्त रखते हैं। असंख्य ऐसे भक्तजन हैं जो उस गुणी निरंकार के गुणों को विचार कर ज्ञान की उपलब्धि करते हैं। असंख्य सत्य को जानने वाले अथवा परमार्थ-पथ पर चलने वाले तथा दानी सज्जन हैं। असंख्य शूरवीर रणभूमि में शत्रु का सामना करते हुए शस्त्रों की मार सहते हैं। असंख्य मानव जीव मौन धारण करके एकाग्रचित होकर उस अकाल-पुरुष में लिवलीन रहते हैं। इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्थता का विचार कर सकूं। हे अनन्त स्वरूप! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार! हे पारब्रह्म! तू सदा शाश्वत रूप हैं।
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