यदि यह शरीर, हाथ-पैर अथवा कोई अन्य अंग मलिन हो जाए तो पानी से धो लेने से उसकी गन्दगी व मिट्टी साफ हो जाती है। यदि कोई वस्त्र पेशाब आदि से अपवित्र हो जाए तो उसे साबुन के साथ धो लिया जाता है। यदि मनुष्य की बुद्धि दुष्कर्मों के करने से मलिन हो जाए तो वह वाहिगुरु के नाम का सिमरन करने से ही पवित्र हो सकती है।
पुण्य और पाप मात्र कहने को ही नहीं हैं। अपितु इस संसार में रहकर जैसे-जैसे कर्म किए जाएँगे वही धर्मराज द्वारा भेजे गए चित्र-गुप्त लिख कर ले जाएंगे अर्थात् मानव जीव द्वारा इस धरती पर किए जाने वाले प्रत्येक अच्छे व बुरे कर्मों का हिसाब उसके साथ ही जाएगा, जिसके फलानुसार उसे स्वर्ग अथवा नरक की प्राप्ति होगी। सो मनुष्य स्वयं ही कर्म बीज बीजता है और स्वयं ही उसका फल प्राप्त करता है।
गुरु नानक का कथन है की जीव इस संसार में अपने कर्मों का फल भोगने हेतु अकाल-पुरुष के आदेश से आता जाता रहेगा, अर्थात् जीव के कर्म उसे आवागमन के चक्र में ही रखेंगे, निरंकार जीव के कर्मों के अनुसार ही उसके फल की आज्ञा करेगा।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
जपजी साहिब के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
जपजी साहिब के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।