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जपजी साहिब • अध्याय 1 • श्लोक 37
ਰਾਤੀ ਰੁਤੀ ਥਿਤੀ ਵਾਰ ॥ ਪਵਣ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਪਾਤਾਲ ॥ ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਧਰਤੀ ਥਾਪਿ ਰਖੀ ਧਰਮ ਸਾਲ ॥ ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਜੀਅ ਜੁਗਤਿ ਕੇ ਰੰਗ ॥ ਤਿਨ ਕੇ ਨਾਮ ਅਨੇਕ ਅਨੰਤ ॥ ਕਰਮੀ ਕਰਮੀ ਹੋਇ ਵੀਚਾਰੁ ॥ ਸਚਾ ਆਪਿ ਸਚਾ ਦਰਬਾਰੁ ॥ ਤਿਥੈ ਸੋਹਨਿ ਪੰਚ ਪਰਵਾਣੁ ॥ ਨਦਰੀ ਕਰਮਿ ਪਵੈ ਨੀਸਾਣੁ ॥ ਕਚ ਪਕਾਈ ਓਥੈ ਪਾਇ ॥ ਨਾਨਕ ਗਇਆ ਜਾਪੈ ਜਾਇ ॥
रात्रियों, ऋतुओं, तिथियों, सप्ताह के वारों, वायु, जल, अग्नि व पाताल आदि यावत प्रपंच हैं। स्रष्टा प्रभु ने उस में पृथ्वी रूपी धर्मशाला स्थापित करके रखी हुई है, इसी को कर्मभूमि कहते हैं। उस धर्मशाला में नाना प्रकार के जीव हैं, जिनकी अनेक भांति की धर्म-कर्म की उपासना की युक्ति है और उनके श्वेत-श्यामादि अनेक प्रकार के वर्ण हैं। उनके अनेक प्रकार के अनंत नाम हैं। संसार में विचरन कर रहे उन अनेकानेक जीवों को अपने शुभाशुभकर्मों के अनुसार ही उन पर विचार किया जाता है। विचार करने वाला वह निरंकार स्वयं भी सत्य है और उसका दरबार भी सत्य है। वही उसके दरबार में शोभायमान होते हैं जो प्रामाणिक संत हैं, जिनके माथे पर कृपालु परमात्मा की कृपा का चिन्ह अंकित होता है। प्रभु के दरबार में कच्चे-पक्के होने का परीक्षण होता है। हे नानक! इस तथ्य का निर्णय वहाँ जाकर ही होता है।
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