सलोक ।।
समस्त सृष्टि का गुरु पवन है, पानी पिता है, और पृथ्वी बड़ी माता है। दिन और रात दोनों धाय एवं धीया (बच्चों को खिलाने वाले) के समान हैं तथा सम्पूर्ण जगत् इन दोनों की गोद में खेल रहा है। शुभ व अशुभ कर्मों का विवेचन उस अकाल-पुरुष के दरबार में होगा। अपने शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप ही जीव परमात्मा के निकट अथवा दूर होता है। जिन्होंने प्रभु का नाम-सुमिरन किया है, वे जप-तप आदि की गई मेहनत को सफल कर गए हैं।
गुरु नानक देव जी कथन करते हैं कि ऐसे सद्राणियों के मुख उज्ज्वल हुए हैं और कितने ही जीव उनके साथ, अर्थात् उनका अनुसरण करके, आवागमन के चक्र से मुक्त हो गए हैं।
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