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अध्याय 98 — अथ नक्षत्रकर्मगुणाध्यायः

बृहत्संहिता
17 श्लोक • केवल अनुवाद
अश्विनी आदि नक्षत्रों के क्रम से शिखि (३) आदि तारे होते हैं। जैसे-अश्विनी में तीन, भरणी में तीन, कृत्तिका में छः, रोहिणी में पाँच, मृगशिरा में तीन, आद्रां में एक, पुनर्वसु में चार, पुष्य में तीन, आश्लेषा में पाँच, मघा में पाँच, पूर्वाफाल्गुनी में दो, उत्तराफाल्गुनी में दो, हस्त में पाँच, चित्रा में एर्के
स्वाति में एक, विशाखा में चार, अनुराधा में चार, ज्येष्ठा में तीन, मूल में ग्यारह, पूर्वाषाढ़ा में दो, उत्तराषाढ़ा में दो, अभिजित् में तीन, श्रवण में तीन, धनिष्ठा में चार, शतभिषा में सौ, पूर्वभाद्रपदा में दो, उत्तरभाद्रपदा में दो और रेवती में बत्तीस तारे होते हैं।
तारों के प्रमाण से नक्षत्रों का फल होता है। जैसे कि विवाह में नक्षत्रों का शुभाशुभ फल तारातुल्य वर्षों में होता है तथा जिस नक्षत्र में ज्वर या अन्य रोग को उत्पत्ति हो, उस नक्षत्र के तारातुल्य दिन में उसका नाश होता है।
अश्विनीकुमार, यम, अग्नि, ब्रह्मा, चन्द्रमा, शिव, अदिति, बृहस्पति, सर्प, भग (सूर्य- विशेष), अर्यमा (सूर्यविशेष), रवि, त्वष्टा (विश्वकर्मा), वायु, इन्द्राग्नी मित्र, इन्द्र, निऋति (राक्षस), जल, विश्वेदेव, ब्रह्मा, विष्णु, वसु, वरुण,
अजचरण ( सूर्यविशेष), अहिर्बुध्न्य (सूर्यविशेष), पूषा (सूर्यविशेष) ये क्रम से अश्विनी आदि नक्षत्रों के स्वामी होते हैं। जैसे-अश्विनीकुमार अश्विनी के, यम भरणी के, अग्नि कृत्तिका के, ब्रह्मा रोहिणी के, चन्द्रमा मृगशिरा के इत्यादि स्वामी होते हैं।
उन पूर्वोक्त नक्षत्रों में से तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र ध्रुव (स्थिर) संज्ञक हैं। इनमें अभिषेक (राजा आदि का अभिषेक), शान्ति (उत्पातों का प्रतीकार), रोपण (वृक्षों का रोपण), नगर (नगरों की प्रतिष्ठा आदि), धर्मक्रिया, बीज (बीजों का बोना) और स्थिर कायर्यों का आरम्भ करना चाहिये।
मूल, आर्दा, ज्येष्ठा, आश्लेषा- ये तीक्ष्णसंज्ञक नक्षत्र हैं। इनमें अभिघात (उपद्रव), मन्त्र (मन्त्रसाधन प्रयोग), बेताल (बेताल के उत्थापन आदि का कर्म), बन्ध (बन्धन), वध, भेद (मिले हुये दो को अलग करना) और सम्बन्ध (राजकुल में आवेदन) को सिद्धि होती है।
तीनों पूर्वा, भरणी, मघा-ये नक्षत्र उग्रसंज्ञक हैं। इनको उत्सादन, नाश (परार्थनाश) शाठ्य- इन कार्यों में योजित करना चाहिये तथा ये नक्षत्र बन्य (बन्धन), विष (शत्रुओं के लिये विष का प्रयोग), दहन (अग्निदाह), राख (शस्त्रप्रहार), घात (मारण) आदि में सिद्धि के लिये होते हैं।
हस्त, अश्विनी, पुष्य-ये लघुसंज्ञक नक्षत्र हैं। ये नक्षत्र पण्य (विक्रय), रति, ज्ञान (शास्त्रारम्भ ), भूषण, कला (चित्र, गीत, वाद्य और नृत्य), शिल्पकर्म, औषध (द्रव्यप्रयोग), यान (यात्रा) आदि में सिद्धि करने वाले होते हैं।
मित्रार्थे । अनुराधा, चित्रा, रेवतो, मृगशिरा-ये नक्षत्र मृदुसंज्ञक है। ये सब मित्र, सुरतविधि, वत्र, भूषण, मंगलकार्य और गाने में सुभ होते हैं
कृत्तिका और विशाखा मृदु तीक्ष्णसंज्ञक नक्षत्र हैं। ये मिश्रित फल करने वाले हैं अर्थात् इनमें मृद्ध एवं दारुण-दोनों कमों को करना चाहिये। श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पुनर्वसु, स्वाति-ये पाँच नक्षत्र चरसंज्ञक है। ये चर कार्य में शुभ होते हैं।
हस्त, चित्रा, स्वाती, मृगशिरा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती, अश्विनी, ज्येष्ठा, पुष्य, पुनर्वसु इन नक्षत्रों में या इन नक्षत्रों के उदयकाल में या इन नकलीं के देवतासम्बन्धी मुहूर्त के उदय में (जैसे- हस्त नक्षत्र का देवता सूर्य है; अतः सूर्यसंज्ञक मुहूर्त के उदय में), चन्द्र और तारा के अनुकूल रहने पर क्षौरकर्म करना शुभ होता है।
स्नान करने के बाद, कहीं पर जाने के समय, तेल आदि लगाने के बाद, युद्ध के समय, विना आसन, सन्ध्याकाल, रात्रि के समय, शनि, मंगल और रविवार में, रिक्ता
राजाओं की आज्ञा से, ब्राह्मणों की सम्मति से तथा विवाहकाल में, मरणाशीच, जननाशौच, कैदी के मुक्त होने और यज्ञ-दीक्षा के समय सभी नक्षत्रों में क्षौरकर्म करना शुभ होता है।
हस्त, मूल, अवण, पुनर्वसु, मृगशिरा और पुष्य-ये पुरुषसंज्ञक नक्षत्र है। इनमें पुरुषसंज्ञक कार्यों का करना शुभ होता है।
हस्त, रेवती, स्वाति, अनुराधा, पुष्य, चित्रा, मृगशिरा-इन नक्षत्रों में तथा शुक, बुध, चन्द्र, गुरु-इन वारों में संस्कार (नामकरणादि), दीक्षा, उपनयन, मौजी आदि ( क्षौरकर्म, विद्याग्रहण) कर्मों को करना चाहिये।
लग्न से द्वादश, केन्द्र और अष्टम गृह में शुभ ग्रह, तृतीय, षष्ठ और एकादश में पाप ग्रह, लग्न या केन्द्र में बृहस्पति या शुक्र हों तो सब कार्यों की सिद्धि होती है तथा कर्मकर्ता को जन्मराशि, ग्राम्य राशि (मेष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु और कुम्भ) या स्थिर राशि (सिंह, वृश्चिक) लग्न में हो तो घर बनाना और गृह में प्रवेश करना शुभ होता है।
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