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बृहत्संहिता • अध्याय 98 • श्लोक 11
हौतभुजं सविशाखं मृदुतीक्ष्णं तद्विभित्रफलकारि । श्रवणत्रयमादित्यानिले च चरकर्मणि हितानि ॥
कृत्तिका और विशाखा मृदु तीक्ष्णसंज्ञक नक्षत्र हैं। ये मिश्रित फल करने वाले हैं अर्थात् इनमें मृद्ध एवं दारुण-दोनों कमों को करना चाहिये। श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पुनर्वसु, स्वाति-ये पाँच नक्षत्र चरसंज्ञक है। ये चर कार्य में शुभ होते हैं।
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