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बृहत्संहिता • अध्याय 98 • श्लोक 8
उम्राणिपूर्वभरणीपित्र्याण्युत्सादनाशशाठ्धेषु योज्यानिः बन्धविषदहनशस्त्रपातादिषु च सिन्क्रयै ॥
तीनों पूर्वा, भरणी, मघा-ये नक्षत्र उग्रसंज्ञक हैं। इनको उत्सादन, नाश (परार्थनाश) शाठ्य- इन कार्यों में योजित करना चाहिये तथा ये नक्षत्र बन्य (बन्धन), विष (शत्रुओं के लिये विष का प्रयोग), दहन (अग्निदाह), राख (शस्त्रप्रहार), घात (मारण) आदि में सिद्धि के लिये होते हैं।
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