शुद्धैर्द्वादशकेन्द्रनैधनगृहैः पापैस्त्रिषष्ठायगै लग्ने केन्द्रगतेऽथवा सुरगुरौ दैत्येन्द्रपूज्येऽपि वा। सर्वारम्भफलप्रसिद्धिरुदये राशी च कर्तुः शुभे सग्राम्यस्थिरभोदये च भवनं कार्य प्रवेशोऽपि वा ॥
लग्न से द्वादश, केन्द्र और अष्टम गृह में शुभ ग्रह, तृतीय, षष्ठ और एकादश में पाप
ग्रह, लग्न या केन्द्र में बृहस्पति या शुक्र हों तो सब कार्यों की सिद्धि होती है तथा कर्मकर्ता को जन्मराशि, ग्राम्य राशि (मेष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु और कुम्भ) या स्थिर राशि (सिंह, वृश्चिक) लग्न में हो तो घर बनाना और गृह में प्रवेश करना शुभ होता है।
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