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बृहत्संहिता • अध्याय 98 • श्लोक 6
त्रीण्युत्तराणि तेभ्यो रोहिण्यश्च ध्रुवाणि तैः कुर्यात् । अभिषेकशान्तितरुनगरचर्मबीजघ्नुवारम्भान् ॥
उन पूर्वोक्त नक्षत्रों में से तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र ध्रुव (स्थिर) संज्ञक हैं। इनमें अभिषेक (राजा आदि का अभिषेक), शान्ति (उत्पातों का प्रतीकार), रोपण (वृक्षों का रोपण), नगर (नगरों की प्रतिष्ठा आदि), धर्मक्रिया, बीज (बीजों का बोना) और स्थिर कायर्यों का आरम्भ करना चाहिये।
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