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अध्याय 93 — अथाश्वेङ्गिताध्यायः
बृहत्संहिता
15 श्लोक • केवल अनुवाद
यह निश्चित है कि घोड़ों के आसनस्थान से पश्चिम या वाम भाग में ज्वलन पैदा हो तो शुभ नहीं होता। इससे विरुद्ध (पूर्व या दक्षिण) भाग में ज्वलन पैदा हो तो शुभ होता है। उत्पातवश घोड़ों के समस्त अवयवों में जो ज्वलन पैदा होता है, उसको सर्वाङ्ग ज्वलन कहते हैं। यह सर्वाङ्ग ज्वलन अवृद्धिकारी होता है। जिस घोड़े के दो वर्ष तक शरीर से अग्निकण या पूओं निकले तो वह भी अवृद्धिकारी होता है।
यदि घोड़ों का लिङ्ग प्रदीप्त हो तो राजा के अन्तःपुर का नाश, पेट प्रदीप्त हो तो खजाने का नाश, गुदा और पूँछ प्रदीप्त हो तो पराजय तथा मुँह और शिर प्रदीप्त हो तो जय होती है।
घोड़े के कन्धा, आसन, ग्रीवा के पार्श्व भाग प्रदीप्त हों तो जय, पाँव प्रदीप्त हो तो स्वामी का वध, ललाट, छाती, आँख और भुजा घूमयुत हो तो पराजय तथा प्रदीप्त हो तो जय के लिये होता है।
रात्रि के समय घोड़े के नासारन्ध्र, प्रोथ (नासामध्य भाग), शिर, अनुपात (गण्डाघो भाग) और नेत्र प्रदीप्त हों तो जय के लिये होता है। पलाश के समान लोहित, कृष्ण, शुक्ल-कृष्ण, कपोत के समान, तोते के समान या सफेद वर्ण वाले घोड़े के एक, दो या अनेक अंगों में सदा ज्वलन हो तो शुभ होता है।
विना कारण घास और पानी से विरक्ति, गिरना, पसीने का आना, काँपना, मुँह से खून निकलना, रात्रि में किसी से द्वेष करते हुये जागना, दिन में नींद, आलस्य और चिन्ता का आना, साद (सुस्ती होना), नीचे मुख करना, ऊपर देखना- घोड़े की ये सभी चेष्टायें अशुभ होती हैं।
पर्याण (तंग तरहा, पुरुष आदि) से युत घोड़े के ऊपर दूसरे घोड़े का चढ़ना, नौरोंग और उपवाह्य ( सवार को पीठ पर लेकर चलते-चलते कुछ नहीं खाने वाले) घोड़े का विपत्ति में आना शुभ नहीं होता है।
घोड़े का क्रौञ्चपक्षी की तरह शब्द करना तथा गर्दन को स्थिर और ऊपर मुख करके शब्द करना, उच्च स्वर से बार-बार मधुर शब्द करना या ग्रास से मुख बन्द रहने पर भी आनन्दपूर्वक शब्द करना शत्रु के वध के लिये होता है।
यदि शब्द करते हुये घोड़े के पास में किसी शुभ द्रव्य से पूर्ण पात्र, दही, ब्राह्मण, देवता, सुगन्धित द्रव्य, फूल, फल, सोना आदि (रजत, मणि, मोतो आदि) या अन्य शुभ द्रव्य आ जायें तो जय होती है।
खाने की सामग्री, जल और लगाम को आनन्दपूर्वक ग्रहण करने वाले, स्वामी की इच्छा के अनुकूल चलने वाले तथा दक्षिण पार्श्व में दृष्टि रखने वाले घोड़े अभीष्ट फल प्रदान करने वाले होते हैं।
बाँयें पैर से पृथ्वी को खोदने वाले घोड़े स्वामी के विदेश गमन के कारण होते हैं तथा सन्ध्याओं (सूर्योदय, मध्याह्न, सूर्यास्त और अर्थ रात्रि) में दीप्त दिशा को देखते हुये शब्द करें तो स्वामी के बन्धन और पराजय के कारण होते हैं।
यदि घोड़े बहुत शब्द करें, पूंछ के बालों को इधर-उधर फैलावें या शयन करें तो यात्रा को सूचित करते हैं तथा यदि बालों को गिरावें, दीन गदहे की तरह शब्द करें या धूली-भक्षण करें तो भय के लिये देखे जाते हैं।
समुद्र ( पात्रविशेष = डिब्बा आदि) की तरह जानुओं को मोड़ कर दक्षिण पार्श्व से शयन करने वाला तथा दाहिने पाँष को उठा स्वामी की जय के लिये होता है। शेष (हाथी, ऊँट आदि) बाहनों में भी पूर्वोक्त कर पृथ्वी पर खड़ा होने वाला घोड़ा यचासम्भव (घूम, अग्निकण के बिना) फलों का आदेश करना चाहिये।
राजा के चढ़ जाने पर जो घोड़ा विनय से युक्त होकर जिस दिशा में राजा को जाने की इच्छा हो, उसी दिशा में चले तथा अन्य घोड़े के शब्द करने पर शब्द करे या मुँह से अपने दक्षिण पार्श्व का स्पर्श करे तो शीघ्र ही स्वामी को लक्ष्मी को वृद्धि करता है।
जो घोड़ा बार-बार मल-मूत्र का त्याग करे, मारने पर भी अभीष्ट दिशा में न चले, बिना कारण डरे और जिसके नेत्र अनुपूर्ण हो जायें, वह करता है।
यह घोड़ों की चेष्टायें कही गयी हैं। इसके बाद हाथियों की चेष्टायें कहता हूँ। उन हाथियों के दाँतों का काँपना, टूटना, मलिन होना आदि चेष्टाओं से फल होते हैं।
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