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बृहत्संहिता • अध्याय 93 • श्लोक 12
समुद्रवद्दक्षिणपार्श्वशायिनः पदं समुत्क्षिप्य च दक्षिणं स्थिताः । जयाय शेषेष्वपि वाहनेष्विदं फलं यथासम्भवमादिशेद् बुधः ॥
समुद्र ( पात्रविशेष = डिब्बा आदि) की तरह जानुओं को मोड़ कर दक्षिण पार्श्व से शयन करने वाला तथा दाहिने पाँष को उठा स्वामी की जय के लिये होता है। शेष (हाथी, ऊँट आदि) बाहनों में भी पूर्वोक्त कर पृथ्वी पर खड़ा होने वाला घोड़ा यचासम्भव (घूम, अग्निकण के बिना) फलों का आदेश करना चाहिये।
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