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बृहत्संहिता • अध्याय 93 • श्लोक 2
अन्तःपुरं नाशमुपैति मेढे कोशः क्षयं यात्युदरे प्रदीप्ते । पायौ च पुच्छे च पराजयः स्याद्वक्त्रोत्तमाङ्गज्वलने जयश्च ॥
यदि घोड़ों का लिङ्ग प्रदीप्त हो तो राजा के अन्तःपुर का नाश, पेट प्रदीप्त हो तो खजाने का नाश, गुदा और पूँछ प्रदीप्त हो तो पराजय तथा मुँह और शिर प्रदीप्त हो तो जय होती है।
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