आरोहति क्षितिपती विनयोपपन्नो यात्रानुगोऽन्यतुरगं प्रतिद्वेषते च। वक्त्रेण वा स्पृशति दक्षिणमात्मपार्श्व योऽश्वः स भर्तुरचिरात् प्रचिनोति लक्ष्मीम् ॥
राजा के चढ़ जाने पर जो घोड़ा विनय से युक्त होकर जिस दिशा में राजा को जाने की इच्छा हो, उसी दिशा में चले तथा अन्य घोड़े के शब्द करने पर शब्द करे या मुँह से अपने दक्षिण पार्श्व का स्पर्श करे तो शीघ्र ही स्वामी को लक्ष्मी को वृद्धि करता है।
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