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बृहत्संहिता • अध्याय 93 • श्लोक 3
स्कन्यासनांसज्वलनं जयाय बन्याय पादज्वलनं प्रदिष्टम् । ललाटवक्षोऽक्षिभुजे च धूमः पराभवाय ज्वलनं जयाय ॥
घोड़े के कन्धा, आसन, ग्रीवा के पार्श्व भाग प्रदीप्त हों तो जय, पाँव प्रदीप्त हो तो स्वामी का वध, ललाट, छाती, आँख और भुजा घूमयुत हो तो पराजय तथा प्रदीप्त हो तो जय के लिये होता है।
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