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बृहत्संहिता • अध्याय 93 • श्लोक 1
उत्सर्गान्न शुभदमासनात् परस्थ वामे च ज्वलनमतोऽपरं प्रशस्तम् । सर्वाङ्गज्वलनमवृद्धिदं हयानां द्वे वर्षे दहनकणाश्च धूपनं वा ॥
यह निश्चित है कि घोड़ों के आसनस्थान से पश्चिम या वाम भाग में ज्वलन पैदा हो तो शुभ नहीं होता। इससे विरुद्ध (पूर्व या दक्षिण) भाग में ज्वलन पैदा हो तो शुभ होता है। उत्पातवश घोड़ों के समस्त अवयवों में जो ज्वलन पैदा होता है, उसको सर्वाङ्ग ज्वलन कहते हैं। यह सर्वाङ्ग ज्वलन अवृद्धिकारी होता है। जिस घोड़े के दो वर्ष तक शरीर से अग्निकण या पूओं निकले तो वह भी अवृद्धिकारी होता है।
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