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बृहत्संहिता • अध्याय 93 • श्लोक 14
मुहुर्मुहुर्मूत्रशकृत् करोति न ताड्यमानोऽप्यनुलोमयायी। अकार्य भीतोऽ श्रुविलोचनश्च शिवं न भर्तुस्तुरगोऽभिधत्ते ॥
जो घोड़ा बार-बार मल-मूत्र का त्याग करे, मारने पर भी अभीष्ट दिशा में न चले, बिना कारण डरे और जिसके नेत्र अनुपूर्ण हो जायें, वह करता है।
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