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बृहत्संहिता • अध्याय 93 • श्लोक 5
प्रद्वेषो यवसाम्भसां प्रपतनं स्वेदो निमित्ताद्विना कम्पो वा वदनाच्च रक्तपतनं धूमस्य वा सम्भवः । अस्वप्नश्च विरोधिनां निशि दिवा निद्रालसध्यानता सादोऽधोमुखता विचेष्टितमिदं नेष्टं स्मृतं वाजिनाम् ॥
विना कारण घास और पानी से विरक्ति, गिरना, पसीने का आना, काँपना, मुँह से खून निकलना, रात्रि में किसी से द्वेष करते हुये जागना, दिन में नींद, आलस्य और चिन्ता का आना, साद (सुस्ती होना), नीचे मुख करना, ऊपर देखना- घोड़े की ये सभी चेष्टायें अशुभ होती हैं।
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