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बृहत्संहिता • अध्याय 93 • श्लोक 15
उक्तमिदं हयचेष्टितमत ऊर्ध्व दन्तिनां प्रवक्ष्यामि । तेषां तु दन्तकल्पनभङ्गम्लानादिचेष्टाभिः ॥
यह घोड़ों की चेष्टायें कही गयी हैं। इसके बाद हाथियों की चेष्टायें कहता हूँ। उन हाथियों के दाँतों का काँपना, टूटना, मलिन होना आदि चेष्टाओं से फल होते हैं।
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