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अध्याय 3 — कर्मयोग
भगवद गीता
43 श्लोक • केवल अनुवाद
अर्जुन ने कहा—
हे जनार्दन!
यदि आपके मत में
ज्ञानरूप बुद्धि
(ज्ञानयोग)
कर्म
से श्रेष्ठ है, तो फिर
हे केशव!
आप मुझे इस
भयंकर कर्म
(युद्ध)
में क्यों प्रवृत्त कर रहे हैं?
आप मानो
मिश्रित और परस्पर भिन्न प्रतीत होने वाले वचनों
से मेरी
बुद्धि को मोहित
कर रहे हैं। इसलिए कृपया
निश्चयपूर्वक एक ही मार्ग
बताइए, जिसके द्वारा मैं
परम श्रेय
को प्राप्त कर सकूँ।
श्रीभगवान् ने कहा—
हे अनघ
(निष्पाप अर्जुन)
! इस संसार में
दो प्रकार की निष्ठाएँ
पहले मेरे द्वारा कही गई हैं—
सांख्य
(तत्त्वचिन्तन करने वाले)
पुरुषों के लिए
ज्ञानयोग
और
योगियों
(कर्ममार्ग का अनुसरण करने वालों)
के लिए
कर्मयोग
।
कर्मों का आरम्भ न करने मात्र से
मनुष्य
नैष्कर्म्य
(कर्मबन्धन से परे अवस्था)
को प्राप्त नहीं होता; और केवल
बाह्य संन्यास
ग्रहण कर लेने से भी वह
सिद्धि
(परम ज्ञान या मोक्ष)
को प्राप्त नहीं करता।
क्योंकि
कोई भी मनुष्य
कभी
क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता
; सभी लोग
प्रकृति से उत्पन्न गुणों
(सत्त्व, रजस् और तमस्)
द्वारा
विवश होकर
कर्म करने के लिए प्रेरित किए जाते हैं।
जो पुरुष
कर्मेन्द्रियों को बाहर से संयमित करके
बैठा रहता है, किन्तु
मन से इन्द्रिय-विषयों का चिन्तन
करता रहता है, वह
मोहग्रस्त
पुरुष
मिथ्याचारी
(दंभी और कपटी)
कहलाता है।
हे अर्जुन!
जो पुरुष
मन द्वारा इन्द्रियों को वश में करके
,
आसक्ति रहित होकर
कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण
करता है, वही
श्रेष्ठ
माना जाता है।
तुम अपने नियत कर्तव्य कर्म का पालन करो
, क्योंकि
कर्म
अकर्म
(कर्तव्य का त्याग)
से श्रेष्ठ है। और
कर्म न करने से
तुम्हारी
शरीर-यात्रा
(जीवन-निर्वाह)
भी सफल नहीं हो सकती।
यज्ञ
(ईश्वरार्पण भाव)
के लिए किए गए कर्मों के अतिरिक्त, अन्य सभी कर्म इस
मनुष्यलोक में बन्धन का कारण
बनते हैं। इसलिए,
हे कौन्तेय!
तुम
आसक्ति से रहित होकर
उसी
यज्ञार्थ
(ईश्वर के लिए)
कर्म का भली-भाँति आचरण करो।
प्रजापति
ने सृष्टि के आरम्भ में
यज्ञ सहित प्रजाओं
की रचना करके कहा—
तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा उन्नति और वृद्धि को प्राप्त होओ
; यह
यज्ञ
तुम्हारी
इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला
(कामधेनु के समान)
हो।
इस
यज्ञ
के द्वारा तुम
देवताओं का पोषण और संवर्धन
करो, और वे
देवता
भी तुम्हारा
पोषण और कल्याण
करें। इस प्रकार
परस्पर एक-दूसरे का संवर्धन करते हुए
तुम
परम श्रेय
को प्राप्त करोगे।
यज्ञ से संतुष्ट हुए देवता
तुम्हें
इच्छित भोग
प्रदान करेंगे। किन्तु उन
देवताओं द्वारा दिए गए पदार्थों
को उन्हें अर्पित किए बिना जो मनुष्य स्वयं भोगता है, वह निश्चय ही
चोर
कहलाता है।
यज्ञ के अवशेष
(ईश्वर को अर्पण करने के पश्चात् प्राप्त अन्न)
का सेवन करने वाले
सज्जन पुरुष
सभी
पापों
से मुक्त हो जाते हैं; किन्तु जो लोग केवल
अपने लिए
भोजन पकाते और भोगते हैं, वे वास्तव में
पाप ही खाते हैं
।
समस्त प्राणी
अन्न
से उत्पन्न और पोषित होते हैं;
अन्न
की उत्पत्ति
वर्षा
से होती है;
वर्षा
यज्ञ
से होती है, और
यज्ञ
कर्म
से उत्पन्न होता है।
कर्म
को
ब्रह्म
(वेद)
से उत्पन्न जानो, और
वेद
(ब्रह्म)
को
अक्षर
(परमात्मा)
से उत्पन्न समझो। इसलिए वह
सर्वव्यापी ब्रह्म
(वेदस्वरूप धर्मव्यवस्था)
सदैव
यज्ञ
में प्रतिष्ठित है।
हे पार्थ!
इस प्रकार
प्रवर्तित किए गए इस सृष्टि-चक्र
का जो मनुष्य
अनुसरण नहीं करता
, और केवल
इन्द्रियों के भोगों में रमण
करता है, वह
पापमय जीवन
जीता है और उसका जीवन
व्यर्थ
हो जाता है।
किन्तु जो मनुष्य
आत्मा में ही रमण करने वाला
है,
आत्मा में ही तृप्त
है, और
आत्मा में ही सन्तुष्ट
रहता है, उसके लिए
करने योग्य कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता
।
उस पुरुष का
कर्म करने से
कोई
प्रयोजन
नहीं होता, और न ही
कर्म न करने से
उसका कोई
हानि या अभाव
होता है। तथा इस संसार में उसका
किसी भी प्राणी पर किसी स्वार्थ की सिद्धि के लिए आश्रय
नहीं रहता।
अतः तुम
आसक्ति का त्याग करके
निरन्तर अपने
कर्तव्य कर्म
का भली-भाँति पालन करो; क्योंकि
आसक्ति रहित होकर कर्म करने वाला पुरुष
परम पद
को प्राप्त कर लेता है।
क्योंकि
जनक आदि राजर्षियों
ने भी
कर्म के द्वारा ही परम सिद्धि
प्राप्त की थी। और
लोकसंग्रह
(लोककल्याण तथा लोगों को धर्ममार्ग में प्रवृत्त रखने)
की दृष्टि से भी तुम्हें
कर्म करना चाहिए
।
जो-जो
श्रेष्ठ पुरुष
आचरण करता है, अन्य लोग भी
उसी का अनुसरण
करते हैं। वह जिस आचरण को
प्रमाण
(आदर्श)
के रूप में स्थापित करता है,
समस्त लोक
उसी का अनुसरण करता है।
हे पार्थ!
तीनों लोकों में
मेरा कोई कर्तव्य
नहीं है। न तो ऐसा कोई पदार्थ है, जो मुझे प्राप्त न हो और जिसे प्राप्त करना शेष हो; फिर भी मैं
निरन्तर कर्म में प्रवृत्त रहता हूँ
।
हे पार्थ!
यदि मैं कभी भी
सावधानीपूर्वक कर्म करने में प्रवृत्त न रहूँ
, तो
मनुष्य
सर्वथा
मेरे ही मार्ग का अनुसरण
करने लगेंगे।
यदि मैं
कर्म न करूँ
, तो ये
समस्त लोक नष्ट-भ्रष्ट
हो जाएँगे। मैं
वर्णसंकर
(धर्म और सामाजिक व्यवस्था के विघटन)
का कारण बनूँगा और इन
प्रजाओं का विनाश
करने वाला हो जाऊँगा।
हे भारत!
जिस प्रकार
अज्ञानी लोग
कर्मों में आसक्त होकर
कर्म करते हैं, उसी प्रकार
विद्वान पुरुष
भी
आसक्ति रहित होकर
,
लोकसंग्रह
(लोककल्याण और समाज की व्यवस्था की रक्षा)
की इच्छा से कर्म करे।
कर्मों में आसक्त अज्ञानी लोगों
की
बुद्धि में भ्रम या विभेद
उत्पन्न नहीं करना चाहिए।
विद्वान पुरुष
, स्वयं
योगयुक्त होकर
सम्यक् आचरण करते हुए, उन्हें भी
उनके कर्तव्य कर्मों में प्रवृत्त
रखे।
प्रकृति के गुणों
(सत्त्व, रजस् और तमस्)
द्वारा ही
समस्त कर्म
सर्वथा किए जाते हैं; किन्तु
अहंकार से मोहित
मनुष्य
"मैं ही कर्ता हूँ"
—ऐसा मानता है।
हे महाबाहो!
किन्तु
तत्त्व को जानने वाला पुरुष
,
गुणों और कर्मों के विभाग
का यथार्थ ज्ञान रखकर, यह समझता है कि
गुण ही गुणों में प्रवृत्त हो रहे हैं
; इसलिए वह
उनमें आसक्त नहीं होता
।
प्रकृति के गुणों से मोहित
लोग
गुणों से उत्पन्न कर्मों में आसक्त
हो जाते हैं। अतः
सम्पूर्ण तत्त्व को जानने वाला
पुरुष, उन
अल्पज्ञ और मन्दबुद्धि
लोगों को
विचलित नहीं करे
।
समस्त कर्मों को मुझमें अर्पित करके
,
आध्यात्मिक बुद्धि
(आत्मतत्त्व में स्थित चित्त)
से युक्त होकर,
आशारहित
,
ममतारहित
तथा
शोक और संताप से रहित
होकर
युद्ध करो
।
जो
मनुष्य
श्रद्धा के साथ
और
दोषदृष्टि से रहित होकर
मेरे इस
उपदेश का नित्य पालन
करते हैं, वे भी
कर्मबन्धन से मुक्त
हो जाते हैं।
किन्तु जो लोग
दोषदृष्टि रखते हुए
मेरे इस
उपदेश का पालन नहीं करते
, उन्हें तुम
समस्त ज्ञान से मोहित
,
विवेकहीन
और
आध्यात्मिक दृष्टि से नष्ट
हुआ जानो।
ज्ञानी पुरुष
भी अपनी
स्वाभाविक प्रकृति
के अनुसार ही आचरण करता है। सभी प्राणी
अपनी-अपनी प्रकृति का ही अनुसरण
करते हैं; अतः
केवल बाह्य दमन
(निग्रह)
से क्या लाभ हो सकता है?
प्रत्येक
इन्द्रिय
के अपने-अपने
विषयों
के प्रति
राग
(आसक्ति)
और
द्वेष
(विरक्ति या प्रतिकूलता)
स्वाभाविक रूप से स्थित हैं। मनुष्य को
इन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए
, क्योंकि ये दोनों उसके
कल्याण के मार्ग में बाधक
(शत्रु)
हैं।
अपने स्वधर्म
का पालन, चाहे वह
दोषयुक्त
ही क्यों न हो,
दूसरे के धर्म
के उत्तम प्रकार से किए गए पालन से भी
श्रेष्ठ
है।
अपने स्वधर्म में मृत्यु
भी कल्याणकारी है, क्योंकि
परधर्म
(दूसरे के कर्तव्य का ग्रहण)
भय उत्पन्न करने वाला
है।
अर्जुन ने कहा—
हे वार्ष्णेय!
मनुष्य
न चाहते हुए भी
, मानो
बलपूर्वक प्रेरित किया गया हो
,
किसके द्वारा प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है
?
श्रीभगवान् ने कहा—
यह
काम
ही है, और यही
क्रोध
है, जो
रजोगुण
से उत्पन्न होता है। यह
अतृप्त रहने वाला
(महाशन)
और
महापापी
है; इसको ही तुम इस संसार में
मनुष्य का महान् शत्रु
जानो।
जिस प्रकार
अग्नि
धुएँ
से ढक जाती है,
दर्पण
मल
से आच्छादित हो जाता है, और जिस प्रकार
गर्भ
उल्ब
(गर्भावरण)
से ढका रहता है, उसी प्रकार
यह ज्ञान
काम
द्वारा आच्छादित हो जाता है।
हे कौन्तेय!
यह
कामरूप
(कामना के रूप में प्रकट होने वाला)
,
कभी न तृप्त होने वाला अग्नि के समान
(दुष्पूर अनल)
तथा
ज्ञानी पुरुष का नित्य शत्रु
है। इसी के द्वारा
ज्ञान आच्छादित
हो जाता है।
इन्द्रियाँ
,
मन
और
बुद्धि
—ये इस
काम
के
आश्रय-स्थान
कहे जाते हैं। इन्हीं के माध्यम से यह
काम
,
ज्ञान को आच्छादित करके
,
देही
(जीवात्मा)
को मोहित कर देता है।
अतः, हे भरतर्षभ!
तुम पहले
इन्द्रियों को वश में करके
, इस
पापरूप शत्रु
(काम)
का नाश करो; क्योंकि यह
ज्ञान
और
विज्ञान
(अनुभवजन्य ज्ञान)
—दोनों का विनाश करने वाला है।
इन्द्रियों
को
श्रेष्ठ
कहा गया है;
इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन
है;
मन से श्रेष्ठ बुद्धि
है; और
बुद्धि से भी जो परे है
, वह
आत्मा
है।
इस प्रकार
बुद्धि से परे स्थित आत्मा
को जानकर, और
बुद्धि के द्वारा मन को स्थिर एवं संयमित करके
,
हे महाबाहो!
इस
दुर्जेय शत्रु
(कामरूप)
का नाश करो।
Krishjan
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