प्रत्येक इन्द्रिय के अपने-अपने विषयों के प्रति राग(आसक्ति) और द्वेष(विरक्ति या प्रतिकूलता) स्वाभाविक रूप से स्थित हैं। मनुष्य को इन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये दोनों उसके कल्याण के मार्ग में बाधक(शत्रु) हैं।
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