अपने स्वधर्म का पालन, चाहे वह दोषयुक्त ही क्यों न हो, दूसरे के धर्म के उत्तम प्रकार से किए गए पालन से भी श्रेष्ठ है। अपने स्वधर्म में मृत्यु भी कल्याणकारी है, क्योंकि परधर्म(दूसरे के कर्तव्य का ग्रहण)भय उत्पन्न करने वाला है।
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