हे भारत! जिस प्रकार अज्ञानी लोगकर्मों में आसक्त होकर कर्म करते हैं, उसी प्रकार विद्वान पुरुष भी आसक्ति रहित होकर, लोकसंग्रह(लोककल्याण और समाज की व्यवस्था की रक्षा) की इच्छा से कर्म करे।
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