उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।।
यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये समस्त लोक नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँगे। मैं वर्णसंकर(धर्म और सामाजिक व्यवस्था के विघटन) का कारण बनूँगा और इन प्रजाओं का विनाश करने वाला हो जाऊँगा।
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