ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः।।
परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मत में दोष-दृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और अविवेकी मनुष्यों को नष्ट हुए ही समझो।
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