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अध्याय 1 — बालकाण्ड
बरवै रामायण
19 श्लोक • केवल अनुवाद
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं
—
(बालक श्रीराम के)
नेत्र बड़े-बड़े हैं, भौंहें टेढ़ी हैं, ललाट विशाल
(चौड़ा)
है, यह मनोहर बालक मन को मोह लेता है।
(अयोध्या के राजभवन की स्त्रियाँ कहती हैं—)
सखी! श्रीराम के ललाट पर केसर का तिलक है, कानों में चञ्नल कुण्डल हैं और जुल्फों से मिलकर गोल-गोल गाल कैसे सुशोभित हो रहे हैं।
मस्तक पर तिलक की रेखा बाण के समान शोभा दे रही है और भौंहें धनुष के समान हैं। मुख की तुलना में तो अकेला
(पूर्णिमा का)
चन्द्रमा ही आ सकता है।
तुलसीदासजी कहते हैं
—
(श्रीराम की)
चितवन तिरछी है, मन्द-मन्द मुसकान उनके होठों पर खेल रही है। प्रभु के नेत्रों को कमल के समान कहकर कैसे वर्णन करूँ,
(क्योंकि ये नेत्र तो नित्य प्रफ्फुल्लित रहते हैं और कमल रात्रि में कुम्हला जाता है)
।
(श्रीराम की)
भौंहों को मैं कभी भी कठोर धनुष के समान नहीं कहूँगा; क्योंकि उस धनुष की दशा यह है कि वह एक बार
(शत्रु के साथ मुठभेड़ होने पर)
तो तन जाता है और अन्त में
(काम होने पर, प्रत्यक्ष से हाथ हटा लिये जाने पर क्रमशः)
उतरता जाता
(ढीला कर दिया जाता)
है
(इधर प्रभु की भौंहें कोमल हैं तथा सदा बाँकी रहती हैं)
।
तुलसीदासजी कहते हैं
— ऐसा कौन कवि है, जो श्रीराम के स्वरूप की तुलना कामदेव के रूप से करके
(इस अपराध से)
संसार रूपी कुएँ
(आवागमन के चक्र)
में पड़ेगा।
श्रीराम साधु
(परम सज्जन)
, उत्तम शील सम्पन्न, उत्तम बुद्धि वाले, पवित्र, सरल स्वभाव के तथा न्यायपरायण हैं, भला कामदेव यह
(सब)
कहाँ पा सकता है?
संकोच के साथ प्रभु ने
(धनुष चलाना)
सीखने के लिये
(हाथ में)
एक तिनके का धनुष लिया।
(यह देख)
प्रसन्न होकर महाराज दशरथ ने एक धनुही
(नन्हा धनुष)
मँगाकर हँसकर उन्हें दिया।
(श्रीराम रूप का वर्णन करने के अनन्तर अब श्री जानकीजी के रूप का वर्णन करते हैं। जनकपुर की स्त्रियाँ परस्पर कह रही हैं—)
सखी!
(श्रीजनककुमारी के)
केशों में गूँथे जाने पर
(उनका नीले रंग की झाईं पड़ने से)
मोती मरकत मणि
(पन्ने)
के बने हुए
(हरे)
प्रतीत होते हैं, किन्तु फिर हाथ में लिये जाने पर वे श्वेत आभा बिखेरने लगते हैं।
सखी! स्वर्ण शोभा
(कान्ति)
में तो श्रीजानकीजी के श्रीअङ्गों के समान है, किन्तु उनकी तुलना में थोड़ा भी सुखदायी
(शीतल)
नहीं है और श्रीजानकी के अंग कोमल हैं, पर स्वर्ण कठोर है।
श्रीसीताजी का मुख शरद-ऋतु के कमल के समान कैसे कहा जाय, क्योंकि वह
(कमल)
तो रात्रि में म्लान होता है, किंतु यह
(श्रीमुख)
रात-दिन
(समान रूप से)
प्रफ्फुल्लित रहता है।
चम्पा के पुष्प की माला श्रीजानकीजी के अंग से सटकर बहुत शोभा देती है, किंतु
(वह उनके शरीर की कान्ति में ऐसी मिल जाती है कि)
उनके हृदय पर माला है, यह पता तब लगता है, जब वह कुम्हिला जाती
(कुछ सूख जाती)
है।
(सखी श्रीजानकीजी से ही कहती है—)
जानकी! तुम्हारे शरीर के रंग से मिलकर पुष्पहार अधिक प्रकाशित होता है और तो और
(तुम्हारे अंग की स्वर्ण कान्ति के कारण)
बेला
(मोगरा)
के पुष्पों की माला मैं
(तुम्हें)
पहनाती हूँ तो वह भी चंपा के पुष्प की माला जान पड़ती है।
(अब श्रीजानकी-स्वयंवर का वर्णन करते हैं। जनकपुर में स्वयंवर के दिन प्रातःकाल श्रीराम-लक्ष्मण ने)
जब अरुणोदय हुआ तब नित्य-नियम
(संध्यादि)
किया। उन्हें देखकर चन्द्रमा के समान
(दूसरे आगत)
राजाओं के मुख कान्तिहीन हो गये।
(स्वयंवर सभा में जनकपुर की नारियाँ श्रीराम को देखकर परस्पर कह रही हैं—)
सखी! यही संदेह की बात है कि धनुष कछुए की पीठ के समान कठोर है। (तब दूसरी सखी कहती है—) उसे ये बड़े तपाक के साथ तोड़ देंगे, स्वयं शंकरजी
(अपने धनुष के टूट जाने को)
कह देंगे।
समस्त नरेश
(धनुष तोड़ने में असफल होकर)
निराश हो गये।
(इससे)
पूरा नगर
(समस्त जनकपुर वासियों का समुदाय)
उदास दिखायी देने लगा। तब श्रीराम ने धनुष को तोड़कर सबका दुःख
(चिन्ता)
दूर कर दिया।
(विवाह के अनन्तर राजभवन में सखियाँ श्रीजानकी जी और श्रीराम के मिलन के समय श्रीजानकीजी से कहती हैं—)
हे नवीना
(मुग्धा)
नारी! घूँघट से मुख क्यों छिपा रही हो, इसी के जैसा चन्द्रमा आकाश में शोभित है
(उसे तो सब देखते ही हैं)
।
(फिर सखियाँ श्रीराम से विनोद करती कहती हैं)
रघुनन्दन! तुम अपने मन में
(अपने सौन्दर्य का)
गर्व मत करो। तुम्हारी मूर्ति
(साँवली होने के कारण)
श्रीजानकीजी की छाया के समान है, यह देख लो।
(विनोद के अनन्तर)
सखियाँ हँसकर यह कोमल वाणी कहती हुई जाने का बहाना बनाकर उठीं कि श्रीजानकी और रघुनाथजी के नेत्र अब नींद से भर गये हैं
(इन्हें अब सोने देना चाहिये)
।
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