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बरवै रामायण • अध्याय 1 • श्लोक 17
का घूँघट मुख मूदहु नवला नारि। चाँद सरग पर सोहत यहि अनुहारि॥
(विवाह के अनन्तर राजभवन में सखियाँ श्रीजानकी जी और श्रीराम के मिलन के समय श्रीजानकीजी से कहती हैं) - हे नवीना (मुग्धा) नारी! घूँघट से मुख क्‍यों छिपा रही हो, इसी के जैसा चन्द्रमा आकाश में शोभित है (उसे तो सब देखते ही हैं)।
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