का घूँघट मुख मूदहु नवला नारि।
चाँद सरग पर सोहत यहि अनुहारि॥
(विवाह के अनन्तर राजभवन में सखियाँ श्रीजानकी जी और श्रीराम के मिलन के समय श्रीजानकीजी से कहती हैं) - हे नवीना (मुग्धा) नारी! घूँघट से मुख क्यों छिपा रही हो, इसी के जैसा चन्द्रमा आकाश में शोभित है (उसे तो सब देखते ही हैं)।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बरवै रामायण के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बरवै रामायण के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।