तुलसीदासजी कहते हैं कि (श्रीराम की) चितवन तिरछी है, मन्द-मन्द मुसकान उनके होठों पर खेल रही है। प्रभु के नेत्रों को कमल के समान कहकर कैसे वर्णन करूँ, (क्योंकि ये नेत्र तो नित्य प्रफ्फुल्लित रहते हैं और कमल रात्रि में कुम्हला जाता है)।
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