सम सुबरन सुषमाकर सुखद न थोर।
सिय अंग सखि कोमल कनक कठोर॥
सखी! स्वर्ण शोभा (कान्ति) में तो श्रीजानकीजी के श्रीअङ्गों के समान है, किन्तु उनकी तुलना में थोड़ा भी सुखदायी (शीतल) नहीं है और श्रीजानकी के अंग कोमल हैं, पर स्वर्ण कठोर है।
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