(स्वयंवर सभा में जनकपुर की नारियाँ श्रीराम को देखकर परस्पर कह रही हैं) सखी! यही संदेह की बात है कि धनुष कछुए की पीठ के समान कठोर है। (तब दूसरी सखी कहती है) उसे ये बड़े तपाक के साथ तोड़ देंगे, स्वयं शंकरजी (अपने धनुष के टूट जाने को) कह देंगे।
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