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बरवै रामायण • अध्याय 1 • श्लोक 8
सींक-धनुष हित सिखन सकुचि प्रभु लीन। मुदित माँगि इक धनुही नृप हँसि दीन॥
संकोच के साथ प्रभु ने (धनुष चलाना) सीखने के लिये (हाथ में) एक तिनके का धनुष लिया। (यह देख) प्रसन्न होकर महाराज दशरथ ने एक धनुही (नन्हा धनुष) मँगाकर हँसकर उन्हें दिया।
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