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बरवै रामायण • अध्याय 1 • श्लोक 5
चढ़त दसा यह उतरत जात निदान। कहौं न कबहूँ करकस भौंह कमान॥
(श्रीराम की) भौंहों को मैं कभी भी कठोर धनुष के समान नहीं कहूँगा; क्योंकि उस धनुष की दशा यह है कि वह एक बार (शत्रु के साथ मुठभेड़ होने पर) तो तन जाता है और अन्त में (काम होने पर, प्रत्यक्ष से हाथ हटा लिये जाने पर क्रमशः) उतरता जाता (ढीला कर दिया जाता) है (इधर प्रभु की भौंहें कोमल हैं तथा सदा बाँकी रहती हैं)।
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