सिय तुव अंग रंग मिलि अधिक उदोत।
हार बेल पहिरावौं चंपक होत॥
(सखी श्रीजानकीजी से ही कहती है) जानकी! तुम्हारे शरीर के रंग से मिलकर पुष्पहार अधिक प्रकाशित होता है और तो और (तुम्हारे अंग की स्वर्ण कान्ति के कारण) बेला (मोगरा) के पुष्पों की माला मैं (तुम्हें) पहनाती हूँ तो वह भी चंपा के पुष्प की माला जान पड़ती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बरवै रामायण के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बरवै रामायण के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।