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बरवै रामायण • अध्याय 1 • श्लोक 13
सिय तुव अंग रंग मिलि अधिक उदोत। हार बेल पहिरावौं चंपक होत॥
(सखी श्रीजानकीजी से ही कहती है) जानकी! तुम्हारे शरीर के रंग से मिलकर पुष्पहार अधिक प्रकाशित होता है और तो और (तुम्हारे अंग की स्वर्ण कान्ति के कारण) बेला (मोगरा) के पुष्पों की माला मैं (तुम्हें) पहनाती हूँ तो वह भी चंपा के पुष्प की माला जान पड़ती है।
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