उठीं सखीं हँसि मिस करि कहि मृदु बैन।
सिय रघुबर के भए उनीदे नैन॥
(विनोद के अनन्तर) सखियाँ हँसकर यह कोमल वाणी कहती हुई जाने का बहाना बनाकर उठीं कि श्रीजानकी और रघुनाथजी के नेत्र अब नींद से भर गये हैं (इन्हें अब सोने देना चाहिये)।
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