नित्य नेम कृत अरून उरय जब कीन।
निरखि निसाकर नृप मुख भए मलीन॥
(अब श्रीजानकी-स्वयंवर का वर्णन करते हैं। जनकपुर में स्वयंवर के दिन प्रातःकाल श्रीराम-लक्ष्मण ने) जब अरुणोदय हुआ तब नित्य-नियम (संध्यादि) किया। उन्हें देखकर चन्द्रमा के समान (दूसरे आगत) राजाओं के मुख कान्तिहीन हो गये।
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